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Thursday, 15 March 2018

Shaligram: Detailed info pujan & importance शालिग्राम प्रकार, पूजन एवम महत्व सम्पूर्ण जानकारी

Shaligram : शालिग्राम: साक्षात् श्री नारायण
एकादशी विशेष

कार्तिक मास का इंतज़ार सनातन धर्म के मानने वालों और भगवान विष्णु, श्री जगन्नाथ और श्री कृष्ण के भक्तों एवं प्रेमियों को बड़ी आतुरता से रहता है।

विशेषतः एकादशी का क्यूंकि इस दिन उनके प्रभु निद्रा से जागते हैं और परम सती भगवती स्वरूपा माँ तुलसी से उनका विवाह होता है।
ये दिन देव प्रबोधिनी/ देवोत्थानी एकादशी के रूप में जन मानस में जाना जाता है।
इसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल द्वादशी को तुलसी विवाह होता है जिसमे श्री शालिग्राम और तुलसी का विवाह होता है।

तुलसी विवाह की चर्चा बिना भगवान् नारायण के शालिग्राम स्वरुप का महात्म्य जाने बिना नहीं हो सकती।

भगवान शालिग्राम श्री नारायण का साक्षात् और स्वयंभू स्वरुप माने जाते हैं।
आश्चर्य की बात है की त्रिदेव में से दो भगवान शिव और विष्णु दोनों ने ही जगत के कल्याण के लिए पार्थिव रूप धारण किया।
जिसप्रकार नर्मदा नदी में निकलने वाले पत्थर नर्मदेश्वर या बाण लिंग साक्षात् शिव स्वरुप माने जाते हैं और स्वयंभू होने के कारन उनकी किसी प्रकार प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती।

ठीक उसी प्रकार शालिग्राम भी नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर को कहते हैं। स्वयंभू होने के कारण इनकी भी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती और भक्त जन इन्हें घर अथवा मन्दिर में सीधे ही पूज सकते हैं।

शालिग्राम भिन्न भिन्न रूपों में प्राप्त होते हैं कुछ मात्र अंडाकार होते हैं तो कुछ में एक छिद्र होता है तथा पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं। कुछ पत्थरों पर सफेद रंग की गोल धारियां चक्र के समान होती हैं। दुर्लभ रूप से कभी कभी पीताभा युक्त शालिग्राम भी प्राप्त होते हैं।
जानकारों व् संकलन कर्ताओं ने इनके विभिन्न रूपों का अध्यन कर इनकी संख्या 80 से लेकर 124 तक बताई है।

शालिग्राम का स्वरूप वर्गीकरण और महिमा का वर्णन

1. - जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान "श्री गदाधर का स्वरूप" समझना चाहिये.

2.- "संकर्षण मूर्ति" में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है.

3.- "प्रद्युम्न" के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है.

4. - "अनिरुद्ध की मूर्ति" गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नीलवर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है.

5. - "भगवान नारायण" श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है.

6. - "भगवान नृसिंह" की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं. ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है. वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं.

7. - जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों, वह "वाराह भगवान का स्वरूप" है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है.

8.- "कच्छप" की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है. उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है. उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है.

9. - "श्रीधर की मूर्ति" में पाँच रेखाएँ होती हैं,

10.- "वनमाली के स्वरूप" में गदा का चिह्न होता है.

11. - गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह "वामन मूर्ति" की पहचान है.

12.- जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान "अनन्त की" प्रतिमा है.

13. - "दामोदर" की मूर्ति स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है. उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है. भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं.

14. - जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को "ब्रह्मा की मूर्ति" समझनी चाहिये.

15. - जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह "श्रीकृष्ण का स्वरूप" है. वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है.

16. - "हयग्रीव मूर्ति" अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है.

17. - "भगवान वैकुण्ठ" कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं. उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है. वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है.

18. - "मत्स्य भगवान" की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है. उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है.

19.- जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान "श्रीरामचंद्र जी" का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं.

20. - द्वारिका पुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप "भगवान गदाधर" को नमस्कार है, उनका दर्शन बड़ा ही उत्तम है.भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं.

21.- "लक्ष्मीनारायण" दो चक्रों से,

22. - "त्रिविक्रम" तीन से,

23.- "चतुर्व्यूह" चार से,

24. - "वासुदेव" पाँच से,

25.- "प्रद्युम्न" छ: से,

26. - "संकर्षण" सात से,

27. - "पुरुषोत्तम" आठ से,

28.- "नवव्यूह" नव से,

29. - "दशावतार" दस से,

30. - "अनिरुद्ध" ग्यारह से और

31.- "द्वादशात्मा" बारह चक्रों से युक्त होकर जगत की रक्षा करते हैं.

32.- इससे अधिक चक्र चिह्न धारण करने वाले भगवान का नाम "अनन्त" है.

दण्ड, कमण्डलु और अक्षमाला धारण करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा तथा पाँच मुख और दस भुजाओं से सुशोभित वृषध्वज महादेव जी अपने आयुधों सहित शालग्रामशिला में स्थित रहते हैं.

गौरी, चण्डी,सरस्वती और महालक्ष्मी आदि माताएँ, हाथ में कमल धारण करने वाले सूर्यदेव, हाथी के समान कंधेवाले गजानन गणेश, छ: मुखों वाले स्वामी कार्तिकेय तथा और भी बहुत-से देवगण शालिग्राम प्रतिमा में मौजूद रहते हैं,अत: मन्दिर में शालिग्राम शिला की स्थापना अथवा पूजा करने पर ये उपर्युक्त देवता भी स्थापित और पूजित होते हैं. जो पुरुष ऐसा करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है।

विभिन्न शालिग्राम के नाम और प्रकार -

शास्त्रों में लगभग 40 प्रकार के प्रमुख शालिग्राम शिलाओ का वर्णन आता है, विभिन्न आकार एवं लक्षणों के आधार पर जिनके नाम इस प्रकार हैं  -

1. – श्री विष्णु शालिग्राम
2. – जनार्दन शालिग्राम
3. – पद्मनाभा शालिग्राम
4. – प्रजापति शालिग्राम
5. – चक्रधर शालिग्राम
6. - त्रिविक्रमा शालिग्राम
7. – नारायण शालिग्राम
8. – श्रीधर शालिग्राम
9. – गोविन्द शालिग्राम
10. – मधुसूदना शालिग्राम
11. – नरसिंह शालिग्राम
12. – जलशयिना शालिग्राम
13. – वराह शालिग्राम
14. – रघुनन्दन शालिग्राम
15. – वामन शालिग्राम
16. – माधव शालिग्राम
17. – सन्थन गोपाल शालिग्राम
18. – हयग्रीव शालिग्राम
19. – लक्ष्मी नरसिंह शालिग्राम
20. – लक्ष्मी नारायण शालिग्राम
21. – रत्न गर्व ज्योति शालिग्राम
22. – कल्की शालिग्राम
23. – बुद्ध शालिग्राम
24. – परशुराम शालिग्राम
25. – राम शालिग्राम
26. – कृष्ण शालिग्राम
27. – विश्वम्भर शालिग्राम
28. – अष्टवक्र शालिग्राम
29. - अच्युत शालिग्राम
30. – श्वेत लक्ष्मी शालिग्राम
31. – मणि प्रभा शालिग्राम
32. – संकर्षण शालिग्राम
33. – नवव्यूह शालिग्राम
34. – दश अवतार शालिग्राम
35. - प्रधुम्न शालिग्राम
36. – पुरुषोतम शालिग्राम
37. – अनिरुद्र शालिग्राम
38. - सुदर्शन और सुदर्शना चक्र शालिग्राम
39. - वैकुण्ठ शिला (बैकुण्ठ शालिग्राम)
40. – केशव शालिग्राम
41.- दामोदर शालिग्राम

श्री शालिग्राम को एक विलक्षण व मूल्यवान पत्थर माना गया है । इसे बहुत सहेज कर रखना चाहिए क्यूंकि ऐसी मान्यता है की शालिग्राम के भीतर अल्प मात्रा में स्वर्ण भी होता है। जिसे प्राप्त करने के लिए चोर इन्हें चुरा लेते हैं।

भगवान् शालिग्राम का पूजन तुलसी के बिना पूर्ण नहीं होता और तुलसी अर्पित करने पर वे तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं।
(किस प्रकार भगवान शिव की मदद हेतु भगवान नारायण दैत्यराज जलंधर को हराने के लिए उसकी पत्नी और अपनी परम भक्त वृंदा यानि तुलसी के श्राप के कारन शिला/ पत्थर रूप कप प्राप्त हुए वो एक दिव्य कथा है)

श्री शालिग्राम पूजन लाभ:-

(1) कार्तिक मास शुक्ल पक्ष द्वादशी को
श्री शालिग्राम और भगवती स्वरूपा तुलसी का विवाह करने से सारे अभाव, कलह, पाप ,दुःख और रोग को दूर हो जाते हैं।

(2)तुलसी शालिग्राम विवाह करवाने से वही पुण्य फल प्राप्त होता है जो की कन्यादान करने से मिलता है।

(3)दैनिक पूजन में श्री शालिग्राम जी को स्नान कराकर चन्दन लगाकर तुलसी दल अर्पित करना और चरणामृत ग्रहण करना। यह उपाय मन, धन व तन की सारी कमजोरियों व दोषों को दूर करने वाला माना गया है।

(4)पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि जिस घर में भगवान शालिग्राम हो, वह घर समस्त तीर्थों से भी श्रेष्ठ है। इनके दर्शन व पूजन से समस्त भोगों का सुख मिलता है।

(5)भगवान शिव ने भी स्कंदपुराण के कार्तिक माहात्मय में भगवान शालिग्राम की स्तुति की है।

(6)ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड अध्याय में उल्लेख है कि जहां भगवान शालिग्राम की पूजा होती है वहां भगवान विष्णु के साथ भगवती लक्ष्मी भी निवास करती है।

(7)पुराणों में यह भी लिखा है कि शालिग्राम शिला का जल जो अपने ऊपर छिड़कता है, वह समस्त यज्ञों और संपूर्ण तीर्थों में स्नान के समान फल पा लेता है।

(8)जो निरंतर शालिग्राम शिला का जल से अभिषेक करता है, वह संपूर्ण दान के पुण्य तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है।

(9)मृत्युकाल में इनके चरणामृत का जलपान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक चला जाता है।

(10)जिस घर में शालिग्राम का नित्य पूजन होता है उसमें वास्तु दोष और बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती है।

(11)पुराणों के अनुसार श्री शालिग्राम जी का तुलसीदल युक्त चरणामृत पीने से भयंकर से भयंकर विष का भी तुरंत नाश हो जाता है।

वृन्दावन के श्री राधारमण लालजू का विग्रह भी अपने अनन्य भक्त श्री गोपाल भट्ट की भक्ति से प्रसन्न हो 472 वर्ष पूर्व प्रकट हुआ था।

तुलसी शालिग्राम का सम्बन्ध कैसा अटूट है इसे इस कहावत से समझा जा सकता है जो इनके लिए ग्रामीण अंचलों में प्रयोग होती है की

" आठ पहर चौसठ घड़ी,
ठाकुर पे ठकुराइन चढ़ी।"

श्री शालिग्राम पूजन विधि:-

श्री शालिग्राम जी को प्रतिदिन प्रातः पंचामृत अथवा गंगाजल युक्त जल अथवा शुद्धजल से स्नान करवाकर श्वेत/ पीले चन्दन का तिलक कर तुलसी जी अर्पण करनी चाहिए। पीले पुष्प अर्पण करने चाहिए। आकर्षक गद्दीदार सिंहासन पर विराजमान कराना चाहिए।

मन्त्र:-

1- ॐ नमो नारायणाय।
2- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

पूजन स्तोत्र:-

॥ शालिग्रामस्तोत्रम् ॥

श्री गणेशाय नमः ।

अस्य श्रीशालिग्रामस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीभगवान् ऋषिः,
नारायणो देवता, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीशालिग्रामस्तोत्रमन्त्रजपे विनियोगः ॥

युधिष्ठिर उवाच ।

श्रीदेवदेव देवेश देवतार्चनमुत्तमम् ।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि ब्रूहि मे पुरुषोत्तम ॥ १॥

श्रीभगवानुवाच ।

गण्डक्यां चोत्तरे तीरे गिरिराजस्य दक्षिणे ।
दशयोजनविस्तीर्णा महाक्षेत्रवसुन्धरा ॥ २॥
शालिग्रामो भवेद्देवो देवी द्वारावती भवेत् ।
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥ ३॥
शालिग्रामशिला यत्र यत्र द्वारावती शिला ।
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥ ४॥
आजन्मकृतपापानां प्रायश्चित्तं य इच्छति ।
शालिग्रामशिलावारि पापहारि नमोऽस्तु ते ॥ ५॥
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
विष्णोः पादोदकं पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम् ॥ ६॥
शङ्खमध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशवोपरि ।
अङ्गलग्नं मनुष्याणां ब्रह्महत्यादिकं दहेत् ॥ ७॥
स्नानोदकं पिवेन्नित्यं चक्राङ्कितशिलोद्भवम् ।
प्रक्षाल्य शुद्धं तत्तोयं ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ८॥
अग्निष्टोमसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।
सम्यक् फलमवाप्नोति विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात् ॥ ९॥
नैवेद्ययुक्तां तुलसीं च मिश्रितां विशेषतः पादजलेन विष्णोः ।
योऽश्नाति नित्यं पुरतो मुरारेः प्राप्नोति यज्ञायुतकोटिपुण्यम् ॥ १०॥
खण्डिताः स्फुटिता भिन्ना वन्हिदग्धास्तथैव च ।
शालिग्रामशिला यत्र तत्र दोषो न विद्यते ॥ ११॥
न मन्त्रः पूजनं नैव न तीर्थं न च भावना ।
न स्तुतिर्नोपचारश्च शालिग्रामशिलार्चने ॥ १२॥
ब्रह्महत्यादिकं पापं मनोवाक्कायसम्भवम् ।
शीघ्रं नश्यति तत्सर्वं शालिग्रामशिलार्चनात् ॥ १३॥
नानावर्णमयं चैव नानाभोगेन वेष्टितम् ।
तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥ १४॥
नारायणोद्भवो देवश्चक्रमध्ये च कर्मणा ।
तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥ १५॥
कृष्णे शिलातले यत्र सूक्ष्मं चक्रं च दृश्यते ।
सौभाग्यं सन्ततिं धत्ते सर्व सौख्यं ददाति च ॥ १६॥
वासुदेवस्य चिह्नानि दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते ।
श्रीधरः सुकरे वामे हरिद्वर्णस्तु दृश्यते ॥ १७॥
वराहरूपिणं देवं कूर्माङ्गैरपि चिह्नितम् ।
गोपदं तत्र दृश्येत वाराहं वामनं तथा ॥ १८॥
पीतवर्णं तु देवानां रक्तवर्णं भयावहम् ।
नारसिंहो भवेद्देवो मोक्षदं च प्रकीर्तितम् ॥ १९॥
शङ्खचक्रगदाकूर्माः शङ्खो यत्र प्रदृश्यते ।
शङ्खवर्णस्य देवानां वामे देवस्य लक्षणम् ॥ २०॥
दामोदरं तथा स्थूलं मध्ये चक्रं प्रतिष्ठितम् ।
पूर्णद्वारेण सङ्कीर्णा पीतरेखा च दृश्यते ॥ २१॥
छत्राकारे भवेद्राज्यं वर्तुले च महाश्रियः ।
चिपिटे च महादुःखं शूलाग्रे तु रणं ध्रुवम् ॥ २२॥
ललाटे शेषभोगस्तु शिरोपरि सुकाञ्चनम् ।
चक्रकाञ्चनवर्णानां वामदेवस्य लक्षणम् ॥ २३॥
वामपार्श्वे च वै चक्रे कृष्णवर्णस्तु पिङ्गलम् ।
लक्ष्मीनृसिंहदेवानां पृथग्वर्णस्तु दृश्यते ॥ २४॥
लम्बोष्ठे च दरिद्रं स्यात्पिङ्गले हानिरेव च ।
लग्नचक्रे भवेद्याधिर्विदारे मरणं ध्रुवम् ॥ २५॥
पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके धारयेत्सदा ।
विष्णोर्द्दष्टं भक्षितव्यं तुलसीदलमिश्रितम् ॥ २६॥
कल्पकोटिसहस्राणि वैकुण्ठे वसते सदा ।
शालिग्रामशिलाबिन्दुर्हत्याकोटिविनाशनः ॥ २७॥
तस्मात्सम्पूजयेद्ध्यात्वा पूजितं चापि सर्वदा ।
शालिग्रामशिलास्तोत्रं यः पठेच्च द्विजोत्तमः ॥ २८॥
स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र लोकेश्वरो हरिः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ २९॥
दशावतारो देवानां पृथग्वर्णस्तु दृश्यते ।
ईप्सितं लभते राज्यं विष्णुपूजामनुक्रमात् ॥ ३०॥
कोट्यो हि ब्रह्महत्यानामगम्यागम्यकोटयः ।
ताः सर्वा नाशमायान्ति विष्णुनैवेद्यभक्षणात् ॥ ३१॥
विष्णोः पादोदकं पीत्वा कोटिजन्माघनाशनम् ।
तस्मादष्टगुणं पापं भूमौ बिन्दुनिपातनात् ॥ ३२॥

।।इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादे
शालिग्रामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

ये लेख एक छोटा सा प्रयास मात्र है इनके अतुलित और अपरम्पार महात्म्य की एक छोटी सी झलक देने का बाकि विराट स्वरुप धारी श्री नारायण भगवान जगन्नाथ के बारे में कुछ कह सकने लायक न मुझे ज्ञान है न क्षमता।

नोट:- ध्यान देने योग्य बात ये है कि आज बाजारवाद के दौर में शालिग्राम जी के भी नकली विग्रह धड़ल्ले से बिक रहे हैं।
काले सीमेंट और पेंट से सांचे में ढाल कर बनाये जा रहे हैं। अतः सरश्रेष्ठ यही होगा यदि आप स्वयम नेपाल जाकर श्रीशालीग्राम शिला प्राप्त करें अथवा किसी बेहद भरोसेमंद व्यक्ति से प्राप्त करें।

अन्य किसी प्रकार की जानकारी ,कुंडली विश्लेषण या समस्या समाधान हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

।।जय श्री राम।।

Abhishek B. Pandey

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1 comment:

  1. अद्भुत सुन्दर वर्णन
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