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Monday, 27 April 2015

Narsinh Jayanti / श्री नृसिंह जयंती

श्री नृसिंह जयंती
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को श्री नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है. ( इस वर्ष 2 मई 2015 को श्री नृसिंह जयंती पडता है) भगवान श्री नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं, पौराणिक मान्यता एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने श्री नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था.

हिन्दू पंचांग के अनुसार श्री नरसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है. पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने श्री नृसिंह रूप में अवतार लिया तथा दैत्यों का अंत कर धर्म कि रक्षा की. अत: इस कारणवश यह दिन भगवान श्री नृसिंह के जयंती रूप में बड़े ही धूमधाम और हर्सोल्लास के साथ संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है.

श्री नरसिंह जयंती कथा

श्री नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है. श्री नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था. धर्म ग्रंथों में भगवान के इस अवतरण के बारे विस्तार पूर्वक विवरण प्राप्त होता है जो इस प्रकार है- प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए थे उनकी पत्नी का नाम दिति था. उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम हरिण्याक्ष तथा दूसरे का हिरण्यकशिपु था.
हिरण्याक्ष को भगवान श्री विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वाराह रूप धरकर मार दिया था. अपने भाई कि मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया. सहस्त्रों वर्षों तक उसने कठोर तप किया, उसकी तपस्या से प्रसन्न हो ब्रह्माजी ने उसे 'अजेय' होने का वरदान दिया. वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, लोकपालों को मार भगा दिया और स्वत: सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया.

देवता निरूपाय हो गए थे वह असुर को किसी प्रकार वे पराजित नहीं कर सकते थे अहंकार से युक्त वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा. इसी दौरान हिरण्यकशिपु कि पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया एक राक्षस कुल में जन्म लेने पर भी प्रह्लाद में राक्षसों जैसे कोई भी दुर्गुण मौजूद नहीं थे तथा वह भगवान नारायण का भक्त था तथा अपने पिता के अत्याचारों का विरोध करता था.

भगवान-भक्ति से प्रह्लाद का मन हटाने और उसमें अपने जैसे दुर्गुण भरने के लिए हिरण्यकशिपु ने बहुत प्रयास किए, नीति-अनीति सभी का प्रयोग किया किंतु प्रह्लाद अपने मार्ग से विचलित न हुआ तब उसने प्रह्लाद को मारने के षड्यंत्र रचे मगर वह सभी में असफल रहा. भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद हर संकट से उबर आता और बच जाता था.

इस बातों से क्षुब्ध हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिन्दा ही जलाने का प्रयास किया. होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती परंतु जब प्रल्हाद को होलिका की गोद में बिठा कर अग्नि में डाला गया तो उसमें होलिका तो जलकर राख हो गई किंतु प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ.
इस घटना को देखकर हिरण्यकशिपु क्रोध से भर गया उसकी प्रजा भी अब भगवान विष्णु को पूजने लगी, तब एक दिन हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि बता, तेरा भगवान कहाँ है? इस पर प्रह्लाद ने विनम्र भाव से कहा कि प्रभु तो सर्वत्र हैं, हर जगह व्याप्त हैं. क्रोधित हिरण्यकशिपु ने कहा कि 'क्या तेरा भगवान इस स्तम्भ (खंभे) में भी है? प्रह्लाद ने हाँ, में उत्तर दिया.

यह सुनकर क्रोधांध हिरण्यकशिपु ने खंभे पर प्रहार कर दिया तभी खंभे को चीरकर श्री नृसिंह भगवान प्रकट हो गए और हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जाँघों पर रखकर उसकी छाती को नखों से फाड़ डाला और उसका वध कर दिया. श्री नृसिंह ने प्रह्लाद की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि आज के दिन जो भी मेरा व्रत करेगा वह समस्त सुखों का भागी होगा एवं पापों से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त होगा अत: इस कारण से दिन को श्री नृसिंह जयंती-उत्सव के रूप में मनाया जाता है.

भगवान श्री नृसिंह जयंती पूजा |
श्री नृसिंह जयंती के दिन व्रत-उपवास एवं पुजा अर्चना कि जाती है इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए तथा भगवान श्री नृसिंह की विधी विधान के साथ पूजा अर्चना करें. भगवान श्री नृसिंह तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित करना चाहिए तत्पश्चात वेदमंत्रों से इनकी प्राण-प्रतिष्ठा कर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए.  भगवान श्री नरसिंह जी की पूजा के लिए फल, पुष्प, पंचमेवा, कुमकुम केसर, नारियल, अक्षत व पीताम्बर रखें. गंगाजल, काले तिल, पञ्च गव्य, व हवन सामग्री का पूजन में उपयोग करें.
भगवान श्री नरसिंह को प्रसन्न करने के लिए उनके श्री नरसिंह गायत्री मंत्र का जाप करें. पूजा पश्चात एकांत में कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस श्री नृसिंह भगवान जी के मंत्र का जप करना चाहिए. इस दिन व्रती को सामर्थ्य अनुसार तिल, स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए. इस व्रत करने वाला व्यक्ति लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है भगवान श्री नृसिंह अपने भक्त की रक्षा करते हैं व उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

भगवान् नरसिंह की उपासना सौम्य रूप में करनी चाहिए
भगवान नरसिंह के प्रमुख 10 रूप है
१) उग्र नरसिंह २) क्रोध नरसिंह ३) मलोल नरसिंह ४) ज्वल नरसिंह ५) वराह नरसिंह ६) भार्गव नरसिंह ७) करन्ज नरसिंह ८) योग नरसिंह ९) लक्ष्मी नरसिंह १०) छत्रावतार नरसिंह/पावन नरसिंह/पमुलेत्रि नरसिंह

दस नामों का उच्चारण करने से कष्टों से मुक्ति और गंभीर रोगों के नाश में लाभ मिलाता है

1 .  नरसिंह कवच

नृसिंहकवचं वक्ष्ये प्रह्लादेनोदितं पुरा | सर्वरक्षकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनम् |१||

सर्व सम्पत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम् |ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितम् ||२||

विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिन्दुसमप्रभम् | लक्ष्म्यालिङ्गितवामाङ्गम् विभूतिभिरुपाश्रितम् ||३||

चतुर्भुजं कोमलाङ्गं स्वर्णकुण्डलशोभितम् |सरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितम् ||४||

तप्त काञ्चनसंकाशं पीतनिर्मलवाससम् |इन्द्रादिसुरमौलिष्ठः स्फुरन्माणिक्यदीप्तिभिः ||५||

विरजितपदद्वन्द्वम् च शङ्खचक्रादिहेतिभिः |गरुत्मत्मा च विनयात् स्तूयमानम् मुदान्वितम् ||६||
स्व हृत्कमलसंवासं कृत्वा तु कवचं पठेत् |नृसिंहो मे शिरः पातु लोकरक्षार्थसम्भवः ||७||

सर्वगेऽपि स्तम्भवासः फलं मे रक्षतु ध्वनिम् |नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः ||८||

स्मृतं मे पातु नृहरिः मुनिवार्यस्तुतिप्रियः |नासं मे सिंहनाशस्तु मुखं लक्ष्मीमुखप्रियः ||९||

सर्व विद्याधिपः पातु नृसिंहो रसनं मम |वक्त्रं पात्विन्दुवदनं सदा प्रह्लादवन्दितः ||१०||

नृसिंहः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ भूभृदनन्तकृत् |दिव्यास्त्रशोभितभुजः नृसिंहः पातु मे भुजौ ||११||

करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः |हृदयं योगि साध्यश्च निवासं पातु मे हरिः ||१२||

मध्यं पातु हिरण्याक्ष वक्षःकुक्षिविदारणः |नाभिं मे पातु नृहरिः स्वनाभिब्रह्मसंस्तुतः ||१३||

ब्रह्माण्ड कोटयः कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिम् |गुह्यं मे पातु गुह्यानां मन्त्राणां गुह्यरूपदृक् ||१४||
ऊरू मनोभवः पातु जानुनी नररूपदृक् |जङ्घे पातु धराभर हर्ता योऽसौ नृकेशरी ||१५||

सुर राज्यप्रदः पातु पादौ मे नृहरीश्वरः |सहस्रशीर्षापुरुषः पातु मे सर्वशस्तनुम् ||१६||

महोग्रः पूर्वतः पातु महावीराग्रजोऽग्नितः |महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वलस्तु नैरृतः ||१७||

पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः |नृसिंहः पातु वायव्यां सौम्यां भूषणविग्रहः ||१८||

ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमङ्गलदायकः |संसारभयतः पातु मृत्योर्मृत्युर्नृकेशई ||१९||

इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमण्डितम् |भक्तिमान् यः पठेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ||२०||

पुत्रवान् धनवान् लोके दीर्घायुरुपजायते |कामयते यं यं कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयम् ||२१||

सर्वत्र जयमाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् |भूम्यन्तरीक्षदिव्यानां ग्रहाणां विनिवारणम् ||२२||

वृश्चिकोरगसम्भूत विषापहरणं परम् |ब्रह्मराक्षसयक्षाणां दूरोत्सारणकारणम् ||२३||

भुजेवा तलपात्रे वा कवचं लिखितं शुभम् |करमूले धृतं येन सिध्येयुः कर्मसिद्धयः ||२४||

देवासुर मनुष्येषु स्वं स्वमेव जयं लभेत् |एकसन्ध्यं त्रिसन्ध्यं वा यः पठेन्नियतो नरः ||२५||

सर्व मङ्गलमाङ्गल्यं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति | द्वात्रिंशतिसहस्राणि पठेत् शुद्धात्मनां नृणाम् ||२६||
कवचस्यास्य मन्त्रस्य मन्त्रसिद्धिः प्रजायते |अनेन मन्त्रराजेन कृत्वा भस्माभिर्मन्त्रानाम् ||२७||

तिलकं विन्यसेद्यस्तु तस्य ग्रहभयं हरेत् |त्रिवारं जपमानस्तु दत्तं वार्याभिमन्त्र्य च ||२८||

प्रसयेद् यो नरो मन्त्रं नृसिंहध्यानमाचरेत् |तस्य रोगः प्रणश्यन्ति ये च स्युः कुक्षिसम्भवाः ||२९||

गर्जन्तं गार्जयन्तं निजभुजपतलं स्फोटयन्तं हतन्तं रूप्यन्तं तापयन्तं दिवि भुवि दितिजं क्षेपयन्तं क्षिपन्तम् |
क्रन्दन्तं रोषयन्तं दिशि दिशि सततं संहरन्तं भरन्तं वीक्षन्तं पूर्णयन्तं करनिकरशतैर्दिव्यसिंहं नमामि ||३०||

||इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे प्रह्लादोक्तं श्रीनृसिंहकवचं सम्पूर्णम्



2.  श्री अथर्वण वेदो क्त नृसिंहमालामन्त्रः

श्री गणेशाय नमः |

अस्य श्री नृसिंहमाला मन्त्रस्य नारदभगवान् ऋषिः | अनुष्टुभ् छन्दः | श्री नृसिंहोदेवता | आं बीजम् | लं शवित्तः | मेरुकीलकम् | श्रीनृसिंहप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः |

ॐ नमो नृसिंहाय ज्वलामुखग्निनेत्रय शङ्खचक्रगदाप्र्हस्ताय | योगरूपाय हिरण्यकशिपुच्छेदनान्त्रमालाविभुषणाय हन हन दह दह वच वच रक्ष वो नृसिंहाय पुर्वदिषां बन्ध बन्ध रौद्रभसिंहाय दक्षिणदिशां बन्ध बन्ध पावननृसिंहाय पश्चिमदिशां बन्ध बन्ध दारुणनृसिंहाय उत्तरदिशां बन्ध बन्ध ज्वालानृसिंहाय आकाशदिशां बन्ध बन्ध लक्ष्मीनृसिंहाय पातालदिशां  बन्ध बन्ध कः कः कंपय कंपय आवेशय आवेशय अवतारय अवतारय शीघ्रं शीघ्रं | ॐ नमो नारसिंहाय नवकोटिदेवग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय अष्टकोटिगन्धर्व ग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय षट्कोटिशाकिनीग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय पंचकोटि पन्नगग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय चतुष्कोटि ब्रह्मराक्षसग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय द्विकोटिदनुजग्रहोच्चाटनाय | ॐ नमो नारसिंहाय कोटिग्रहोच्चाटनाय| ॐ नमो नारसिंहाय अरिमूरीचोरराक्षसजितिः वारं वारं | श्रीभय चोरभय व्याधिभय सकल भयकण्टकान् विध्वंसय विध्वंसय | शरणागत वज्रपंजराय विश्वहृदयाय प्रल्हादवरदाय क्षरौं श्रीं नृसिंहाय स्वाहा | ॐ नमो नारसिंहाय मुद्गल शङ्खचक्र गदापद्महस्ताय नीलप्रभांगवर्णाय भीमाय भीषणाय ज्वाला करालभयभाषित श्री नृसिंहहिरण्यकश्यपवक्षस्थलविदार्णाय | जय जय एहि एहि भगवन् भवन गरुडध्वज गरुडध्वज मम सर्वोपद्रवं वज्रदेहेन चूर्णय चूर्णय आपत्समुद्रं शोषय शोषय | असुरगन्धर्वयक्षब्रह्मराक्षस भूतप्रेत पिशाचदिन विध्वन्सय् विध्वन्सय् | पूर्वाखिलं मूलय मूलय | प्रतिच्छां स्तम्भय परमन्त्रपयन्त्र परतन्त्र परकष्टं छिन्धि छिन्धि भिन्धि हं फट् स्वाहा |

इति श्री अथर्वण वेदोवत्तनृसिंहमालामन्त्रः समाप्तः |
श्री नृसिम्हार्पणमस्तु ||


3.   नरसिंह गायत्री
ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्ण दंष्ट्राय धीमहि |तन्नो नरसिंह प्रचोदयात ||

पांच माला के जाप से आप पर भगवान नरसिंह की कृपा होगी
इस महा मंत्र के जाप से क्रूर ग्रहों का ताप शांत होता है
कालसर्प दोष, मंगल, राहु ,शनि, केतु का बुरा प्रभाव नहीं हो पाटा
एक माला सुबह नित्य करने से शत्रु शक्तिहीन हो जाते हैं
संध्या के समय एक माला जाप करने से कवच की तरह आपकी सदा रक्षा होती है
यज्ञ करने से भगवान् नरसिंह शीघ्र प्रसन्न होते हैं
जो बिधि-विधान से पूजा नहीं कर पाते और जो मनो कामना पूरी करना चाहते है, उन्हें बीज मंत्र द्वारा साधना करनी चाहिए

4 )संपत्ति बाधा नाशक मंत्र
यदि आपने किसी भी तरह की संपत्ति खरीदी है गाड़ी, फ्लेट, जमीन या कुछ और उसके कारण आया संकट या बाधा परेशान कर रही है तो संपत्ति का नरसिंह मंत्र जपें
भगवान नरसिंह या विष्णु जी की प्रतिमा का पूजन करें
धूप दीप पुष्प अर्पित कर प्रार्थना करें
सात दिये जलाएं
हकीक की माला से पांच माला मंत्र का जाप करें
काले रंग के आसन पर बैठ कर ही मंत्र जपें

मंत्र-ॐ नृम मलोल नरसिंहाय पूरय-पूरय

मंत्र जाप संध्या के समय करने से शीघ्र फल मिलता है

5)ऋण मोचक नरसिंह मंत्र
है यदि आप ऋणों में उलझे हैं और आपका जीवन नरक हो गया है, आप तुरंत इस संकट से मुक्ति चाहते हैं तो ऋणमोचक नरसिंह मंत्र का जाप करें
भगवान नरसिंह की प्रतिमा का पूजन करें
पंचोपचार पूजन कर फल अर्पित करते हुये प्रार्थना करें
मिटटी के पात्र में गंगाजल अर्पित करें
हकीक की माला से छ: माला मंत्र का जाप करें
काले रंग के आसन पर बैठ कर ही मंत्र जपें

मंत्र-ॐ क्रोध नरसिंहाय नृम नम:

रात्रि के समय मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

6 )शत्रु नाशक नरसिंह मंत्र

यदि आपको कोई ज्ञात या अज्ञात शत्रु परेशान कर रहा हो तो शत्रु नाश का नरसिंह मंत्र जपें
भगवान विष्णु जी की प्रतिमा का पूजन करें
धूप दीप पुष्प सहित जटामांसी अवश्य अर्पित कर प्रार्थना करें
चौमुखे तीन दिये जलाएं
हकीक की माला से पांच माला मंत्र का जाप करें
काले रंग के आसन पर बैठ कर ही मंत्र जपें

मंत्र-ॐ नृम नरसिंहाय शत्रुबल विदीर्नाय नमः

रात्री को मंत्र जाप से जल्द फल मिलता है

7 )यश रक्षक मंत्र
यदि कोई आपका अपमान कर रहा है या किसी माध्यम से आपको बदनाम करने की कोशिश कर रहा है तो यश रक्षा का नरसिंह मंत्र जपें
भगवान नरसिंह जी की प्रतिमा का पूजन करें
कुमकुम केसर गुलाबजल और धूप दीप पुष्प अर्पित कर प्रार्थना करें
सात तरह के अनाज दान में दें
हकीक की माला से सात माला मंत्र का जाप करें
काले रंग के आसन पर बैठ कर ही मंत्र जपें

मंत्र-ॐ करन्ज नरसिंहाय यशो रक्ष

संध्या के समय किया गया मंत्र शीघ्र फल देता है

8 . मृत्युंभय नाश केलिए

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्।।


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Friday, 24 April 2015

Baglamukhi Jayanti / बगलामुखी जयंती

मित्रों
          २६ अप्रैल  दिन रविवार को माँ बगुलामुखी जयंती है और आप सबको अनेक शुभकामनायें।  माँ  आपको स्वस्थ सुरक्षित रखें और सभी संकटों से रक्षा करें तथा अभी मनोकामनाएं पूर्ण करें।

माँ बगलामुखी १० महाविद्याओं में आठवां  स्वरुप हैं।  ये महाविद्यायें भोग और मोक्ष दोनों को देने वाली हैं। सांख़यायन तन्त्र के अनुसार बगलामुखी को सिद्घ विद्या कहा गया है।

तन्त्र शास्त्र में इसे ब्रह्मास्त्र, स्तंभिनी विद्या, मंत्र संजीवनी विद्या तथा प्राणी प्रज्ञापहारका एवं षट्कर्माधार विद्या के नाम से भी अभिहित किया गया है।

सांख़यायन तंत्र के अनुसार ‘कलौ जागर्ति पीतांबरा।’ अर्थात कलियुग के तमाम संकटों के निराकरण में भगवती पीता बरा की साधना उत्तम मानी गई है। अतः आधि व्याधि से त्रस्त वर्तमान समय में मानव मात्र माँ पीतांबरा की साधना कर अत्यन्त विस्मयोत्पादक अलौकिक सिद्घियों को अर्जित कर अपनी समस्त अभिलाषाओं को प्राप्त कर सकता है।

बगलामुखी की साधना से साधक भयरहित हो जाता है और शत्रु से उसकी रक्षा होती है। बगलामुखी का स्वरूप रक्षात्मक, शत्रुविनाशक एवं स्तंभनात्मक है। यजुर्वेद के पंचम अध्याय में ‘रक्षोघ्न सूक्त’ में इसका वर्णन है।
इसका आविर्भाव प्रथम युग में बताया गया है। देवी बगलामुखी जी की प्राकट्य कथा इस प्रकार  है जिसके अनुसार :-

एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच जाता है और अनेकों लोक संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया. यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए.

इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव उनसे कहते हैं कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएँ, तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुँच कर कठोर तप करते हैं. भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया देवी शक्ति उनकी साधना से प्रसन्न हुई और सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीडा करती श्रीविद्या के  के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ और तेज से भगवती पीतांबरा का प्राकट्य हुआ

उस समय चतुर्दशी की रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्र्येलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी नें प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका.जब समस्त संसार के नाश के लिए प्रकृति में आंधी तूफान आया उस समय विष्णु भगवान संसार की रक्षा के लिये तपस्या करने लगे।
उनकी तपस्या से सौराष्ट्र में पीत सरोवर में । इनका आविर्भाव वीर रात्रि को माना गया है। शक्ति संग तंत्र के काली खंड के त्रयोदश पटल में वीर रात्रि का वर्णन इस प्रकार है

चतुर्दशी संक्रमश्च कुलर्क्ष कुलवासरः अर्ध रात्रौ यथा योगो वीर रात्रिः प्रकीर्तिता।

भगवती पीतांबरा के मंत्र का छंद वृहती है। ऋषि ब्रह्मा हैं, जो सर्व प्रकार की वृद्घि करने वाले हैं। भगवती सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं। इसके भक्त धन धान्य से पूर्ण रहते हैं।

भगवती पीतांबरा की पूजा पीतोपचार से होती है। पीतपुष्ष, पीत वस्त्र, हरिद्रा की माला, पीत नैवेद्य आदि पीतरंग इनको प्रिय हैं। इनकी पूजा में प्रयुक्त की जाने वाली हर वस्तु पीले रंग की ही होती है।

भगवती के अनेक साधकों का वर्णन तंत्र ग्रंथों में उपलब्ध है। सर्व प्रथम ब्रह्मास्त्र रूपिणी बगला महाविद्या का उपदेश ब्रह्माजी ने सनकादि ऋषियों को दिया। वहाँ से नारद, परशुराम आदि को इस महाविद्या का उपदेश हुआ। भगवान परशुराम शाक्तमार्ग के आचार्य हैं।

भगवान परशुराम को स्तंभन शक्ति प्राप्त थी। स्तंभन शक्ति के बल से शत्रु को पराजित करते थे।

 देवी बगलामुखी को ब्रह्मास्त्र विद्या भी कहते हैं क्यूंकि ये स्वयं  ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं, इनके शिव को एकवक्त्र महारुद्र कहा जाता है इसी लिए देवी सिद्ध विद्या हैं. तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं, गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं.

माँ बगलामुखी का  बीज मंत्र :- ह्लीं

मूल मंत्र :-  !!ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं
                 स्तम्भय जिह्वां किलय बुध्दिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा!!

ग्रंथों के अनुसार ये मन्त्र सवा लाख जप कर के सिद्ध हो जाता है किन्तु वास्तविकता कहिये या कलयुग के प्रभाव से ये इससे १०  या और बी कई गुना अधिक जप के बाद ही सिद्ध होता है।

 ये एक अति उग्र मंत्र है और गलत उच्चारण  जप करने पर उल्टा नुकसान भी दे सकता है।

बिना सही विधि के जप करने पर मन्त्र में शत्रु के नाश के लिए कही गयी बातें स्वयं पर ही असर कर सकती है अतः गुरु से दीक्षा लेने और विधान जानने के बाद ही माँ का जप या साधना करनी चाहिए।
दूसरी बात माँ का मूल मंत्र जो की सबसे प्रचलित भी है इसका  असर दिखने में काफी समय लगता है या यूँ कहिये की माँ साधक के धैर्य की परीक्षा लेती हैं और उसके बाद ही अपनी कृपा का अमृत बरसाती हैं।


माँ का मूल मन्त्र करने से पूर्व गायत्री मंत्र या बीज मन्त्र या माँ का ही कोई अन्य सौम्य मंत्र कर लिया जाये तो इसका प्रभाव शीघ्र मिलता है।

जप आरम्भ करने से पूर्व बगलामुखी कवच और अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पथ करने से साधक सब प्रकार की बाधाओं और जप/ साधना  में विघ्न उत्पन्न करने वाली शक्तियों से सुरक्षित रहता है और सफल होता है।

शास्त्रानुसार यदि सिर्फ कवच और अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का ही १००० बार निर्विघ्न रूप से साधनात्मक तरीके से पाठ  कर लिया जाये तो ये जागृत हो जाते हैं और फिर साधक इनके माध्यम से भी कई कर संपन्न कर सकता है।

बगलामुखी स्तोत्र

नमो देवि बगले! चिदानंद रूपे, नमस्ते जगद्वश-करे-सौम्य रूपे।
नमस्ते रिपु ध्वंसकारी त्रिमूर्ति, नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते।।
सदा पीत वस्त्राढ्य पीत स्वरूपे, रिपु मारणार्थे गदायुक्त रूपे।
सदेषत् सहासे सदानंद मूर्ते, नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते।।
त्वमेवासि मातेश्वरी त्वं सखे त्वं, त्वमेवासि सर्वेश्वरी तारिणी त्वं।
त्वमेवासि शक्तिर्बलं साधकानाम, नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते।।
 रणे, तस्करे घोर दावाग्नि पुष्टे, विपत सागरे दुष्ट रोगाग्नि प्लुष्टे।।
त्वमेका मतिर्यस्य भक्तेषु चित्ता, सषट कर्मणानां भवेत्याशु दक्षः।।

 बगलामुखी कवचं

श्रुत्वा च बगलापूजां स्तोत्रं चाप महेश्वर ।
इदानी श्रोतुमिच्छामि कवचं वद मे प्रभो ॥ १ ॥
वैरिनाशकरं दिव्यं सर्वाSशुभविनाशनम् ।
शुभदं स्मरणात्पुण्यं त्राहि मां दु:खनाशनम् ॥२॥
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श्रीभैरव उवाच :
कवचं शृणु वक्ष्यामि भैरवीप्राणवल्लभम् ।
पठित्वा धारयित्वा तु त्रैलोक्ये विजयी भवेत् ॥३॥
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ॐ अस्य श्री बगलामुखीकवचस्य नारद ऋषि: ।
अनुष्टप्छन्द: । बगलामुखी देवता । लं बीजम् ।
ऐं कीलकम् पुरुषार्थचष्टयसिद्धये जपे विनियोग: ।
ॐ शिरो मे बगला पातु हृदयैकाक्षरी परा ।
ॐ ह्ली ॐ मे ललाटे च बगला वैरिनाशिनी ॥१॥
गदाहस्ता सदा पातु मुखं मे मोक्षदायिनी ।
वैरिजिह्वाधरा पातु कण्ठं मे वगलामुखी ॥२॥
उदरं नाभिदेशं च पातु नित्य परात्परा ।
परात्परतरा पातु मम गुह्यं सुरेश्वरी ॥३॥
हस्तौ चैव तथा पादौ पार्वती परिपातु मे ।
विवादे विषमे घोरे संग्रामे रिपुसङ्कटे ॥४॥
पीताम्बरधरा पातु सर्वाङ्गी शिवनर्तकी ।
श्रीविद्या समय पातु मातङ्गी पूरिता शिवा ॥५॥
पातु पुत्रं सुतांश्चैव कलत्रं कालिका मम ।
पातु नित्य भ्रातरं में पितरं शूलिनी सदा ॥६॥
रंध्र हि बगलादेव्या: कवचं मन्मुखोदितम् ।
न वै देयममुख्याय सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ ७॥
पाठनाद्धारणादस्य पूजनाद्वाञ्छतं लभेत् ।
इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् बगलामुखीम् ॥८॥
पिवन्ति शोणितं तस्य योगिन्य: प्राप्य सादरा: ।
वश्ये चाकर्षणो चैव मारणे मोहने तथा ॥९॥
महाभये विपत्तौ च पठेद्वा पाठयेत्तु य: ।
तस्य सर्वार्थसिद्धि: स्याद् भक्तियुक्तस्य पार्वति ॥१०॥
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(इति श्रीरुद्रयामले बगलामुखी कवचं सम्पूर्ण )






माता बगलामुखी अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्र
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ब्रह्मास्त्ररुपिणी देवी माता श्रीबगलामुखी ।
चिच्छिक्तिर्ज्ञान-रुपा च ब्रह्मानन्द-प्र
दायिनी ।। १ ।।
महाविद्या महालक्ष्मी श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ।
भुवनेशी जगन्माता पार्वती सर्वमंगला ।। २ ।।
ललिता भैरवी शान्ता अन्नपूर्णा कुलेश्वरी ।
वाराही छीन्नमस्ता च तारा काली सरस्वती ।।
३ ।।
जगत्पूज्या महामाया कामेशी भगमालिनी ।
दक्षपुत्री शिवांकस्था शिवरुपा शिवप्रिया ।। ४
।।
सर्व-सम्पत्करी देवी सर्वलोक वशंकरी ।
विदविद्या महापूज्या भक्ताद्वेषी भयंकरी ।। ५
।।
स्तम्भ-रुपा स्तम्भिनी च दुष्टस्तम्भनकारिणी ।
भक्तप्रिया महाभोगा श्रीविद्या ललिताम्बिका ।।
६ ।।
मैनापुत्री शिवानन्दा मातंगी भुवनेश्वरी ।
नारसिंही नरेन्द्रा च नृपाराध्या नरोत्तमा ।। ७
।।
नागिनी नागपुत्री च नगराजसुता उमा ।
पीताम्बा पीतपुष्पा च पीतवस्त्रप्रिया शुभा ।।
८ ।।
पीतगन्धप्रिया रामा पीतरत्नार्चिता शिवा ।
अर्द्धचन्द्रधरी देवी गदामुद्गरधारिणी ।। ९ ।।
सावित्री त्रिपदा शुद्धा सद्योराग विवर्धिनी ।
विष्णुरुपा जगन्मोहा ब्रह्मरुपा हरिप्रिया ।। १०
।।
रुद्ररुपा रुद्रशक्तिश्चिन्मयी भक्तवत्सला ।
लोकमाता शिवा सन्ध्या शिवपूजनतत्परा ।। ११
।।
धनाध्यक्षा धनेशी च नर्मदा धनदा धना ।
चण्डदर्पहरी देवी शुम्भासुरनिबर्हिणी ।। १२ ।।
राजराजेश्वरी देवी महिषासुरमर्दिनी ।
मधूकैटभहन्त्री देवी रक्तबीजविनाशिनी ।। १३ ।।
धूम्राक्षदैत्यहन्त्री च भण्डासुर विनाशिनी ।
रेणुपुत्री महामाया भ्रामरी भ्रमराम्बिका ।। १४
।।
ज्वालामुखी भद्रकाली बगला शत्रुनाशिनी ।
इन्द्राणी इन्द्रपूज्या च गुहमाता गुणेश्वरी ।। १५
।।
वज्रपाशधरा देवी ज्ह्वामुद्गरधारिणी ।
भक्तानन्दकरी देवी बगला परमेश्वरी ।। १६ ।।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां बगलायास्तु यः पठेत् ।
रिपुबाधाविनिर्मुक्तः लक्ष्मीस्थैर्यमवाप्नुयात् ।।
१७ ।।
भूतप्रेतपिशाचाश्च ग्रहपीड़ानिवारणम् ।
राजानो वशमायांति सर्वैश्वर्यं च विन्दति ।। १८
।।
नानाविद्यां च लभते राज्यं प्राप्नोति निश्चितम्

भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति साक्षात् शिवसमो भवेत् ।।

(श्री रुद्रयामले सर्वसिद्धिप्रद बगला अष्टोत्तरशतनाम स्त्रोत्रम )


बगुलामुखी यन्त्र

आज के इस भागदौड़ के युग में श्री बगलामुखी यंत्र की साधना अन्य किसी भी साधना से अधिक उपयोगी है। यह एक परीक्षित और अनुभवसिद्ध तथ्य है। इसे गले में पहनने के साथ-साथ पूजा घर में भी रख सकते हैं। इस यंत्र की पूजा पीले दाने, पीले वस्त्र, पीले आसन पर बैठकर निम्न मंत्र को प्रतिदिन जप करते हुए करनी चाहिए। अपनी सफलता के लिए कोई भी व्यक्ति इस यंत्र का उपयोग कर सकता है। इसका वास्तविक रूप में प्रयोग किया गया है। इसे अच्छी तरह से अनेक लोगों पर उपयोग करके देखा गया है। 

शास्त्रानुसार और वरिष्ठ सड़कों के अनुभव के अनुसार  जिस घर में यह महायंत्र स्थापित होता है, उस घर पर कभी भी शत्रु या किसी भी प्रकार की विपत्ति  हावी नहीं हो सकती। न उस घर के किसी सदस्य पर आक्रमण हो सकता है, न ही उस परिवार में किसी की अकाल मृत्यु हो सकती है। इसीलिए इसे महायंत्र की संज्ञा दी गई है।  इससे दृश्य/अदृश्य बाधाएं समाप्त होती हैं। यह यंत्र अपनी पूर्ण प्रखरता से प्रभाव दिखाता है। उसके शारीरिक और मानसिक रोगों तथा ऋण, दरिद्रता आदि से उसे मुक्ति मिल जाती है। वहीं उसकी पत्नी और पुत्र सही मार्ग पर आकर उसकी सहायता करते हैं। उसके विश्वासघाती मित्र और व्यापार में साझीदार उसके अनुकूल हो जाते हैं।

 शत्रुओं के शमन (चाहे बाहरी हो या घरेलू कलह , दरिद्रता या शराब / नशे व्यसन रूप में भीतरी शत्रु ),रोजगार या व्यापार आदि में आनेवाली बाधाओं से मुक्ति, मुकदमे में सफलता के लिए , टोने टोटकों के प्रभाव से बचाव आदि के लिए किसी साधक के द्वारा सिद्ध मुहूर्त में निर्मित, बगलामुखी तंत्र से अभिसिंचित तथा प्राण प्रतिष्ठित श्री बगलामुखी यंत्र घर में स्थापित करना चाहिए या कवच रूप में धारण करना चाहिए।

बगलामुखी हवन

 १)  वशीकरण : मधु, घी और शर्करा मिश्रित तिल से किया जाने वाला हवन (होम) मनुष्यों को वश में करने वाला माना गया है। यह हवन आकर्षण बढ़ाता है।

२) विद्वेषण : तेल से सिक्त नीम के पत्तों से किया जाने वाला हवन विद्वेष दूर करता है।

३) शत्रु नाश : रात्रि में श्मशान की अग्नि में कोयले, घर के धूम, राई और माहिष गुग्गल के होम से शत्रु का शमन होता है।

४) उच्चाटन : गिद्ध तथा कौए के पंख, कड़वे तेल, बहेड़े, घर के धूम और चिता की अग्नि से होम करने से साधक के शत्रुओं को उच्चाटन लग जाता है।

५) रोग नाश : दूब, गुरुच और लावा को मधु, घी और शक्कर के साथ मिलाकर होम करने पर साधक सभी रोगों को मात्र देखकर दूर कर देता है।

६ ) मनोकामना पूर्ति : कामनाओं की सिद्धि के लिए पर्वत पर, महावन में, नदी के तट पर या शिवालय में एक लाख जप  करें।

७) विष नाश / स्तम्भन :
एक रंग की गाय के दूध में मधु और शक्कर मिलाकर उसे तीन सौ मंत्रांे से अभिमंत्रित करके पीने से सभी विषों की शक्ति समाप्त हो जाती है और साधक शत्रुओं की शक्ति तथा बुद्धि का स्तम्भन करने में सक्षम होता है।

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Monday, 20 April 2015

Akshay Tritiya: Unlimited Benefits अक्षय तृतीया: अतुल फलदायी

इस बार अक्षय तृतीया पर 11 साल बाद महामंगल योग बन रहा है. 21 अप्रैल को सूर्य मेष, चंद्रमा वृषभ और गुरु कर्क राशि में रहकर मंगलकारी योग बनाएंगे.

इस दिन दोपहर 11.59 बजे तक कृतिका व इसके बाद रोहिणी नक्षत्र लगेगा. चंद्रमा के उच्च राशि में रहने से दोनों नक्षत्र भी हर प्रकार के कार्यों में शुभता बढ़ाएंगे.

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को “अक्षय तृतीया” या “आखा तृतीया” अथवा “आखातीज” भी कहते हैं। “अक्षय” का शब्दिक अर्थ है – जिसका कभी नाश (क्षय) न हो अथवा जो स्थायी रहे। स्थायी वहीं रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। सत्य केवल परमात्मा है जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है।

-> यह अक्षय तृतीया तिथि “ईश्वर तिथि” है।

-> इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है।

-> परशुरामजी की गिनती चिंरजीवी महात्माओं में की जाती है। अत: यह तिथि “चिरंजीवी तिथि” भी कहलाती है।

-> चारों युगों – सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग का आरंभ इसी आखातीज से हुआ है जिससे इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि “युर्गाद तिथि” भी कहते हैं।

-> मातंगी जयंती : शक्ति साधकों के लिए भी ये अतिमहत्वपूर्ण दिन है क्योंकि ये दस महाविद्याओं में से एक देवी मातंगी की भी जयंती है इस्लीये कला संगीत का अभ्यास या अध्ययन का आरंभ करने के लिए यह काल सर्वश्रेष्ठ है।

भौतिकता के अनुयायी इस काल को स्वर्ण खरीदने का श्रेष्ठ काल मानते हैं। इसके पीछे शायद इस तिथि की ‘अक्षय’ प्रकृति ही मुख्य कारण है। यानी सोच यह है कि यदि इस काल में हम यदि घर में स्वर्ण लाएंगे तो अक्षय रूप से स्वर्ण आता रहेगा। अक्षय तृतीया कुंभ स्नान व दान पुण्य के साथ पितरों की आत्मा की शांति के लिए अराधना का दिन भी माना गया है। 

अक्षय तृतीया के विषय में मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा अगर कोई बुरा काम करेंगे तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा।

धरती पर देवताओं ने 24 रूपों में अवतार लिया। इनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का था। पुराणों में उनका जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था। इस दिन भगवान विष्णु के चरणों से धरती पर गंगा अवतरित हुई।

मातंगी : मतंग शिव का नाम है। शिव की यह शक्ति असुरों को मोहित करने वाली और साधकों को अभिष्ट फल देने वाली है। गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए लोग इनकी पूजा करते हैं। अक्षय तृतीया अर्थात वैशाख शुक्ल की तृतीया को इनकी जयंती आती है।
यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही पूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं।

पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह महाविद्या कारगर होती है।

शास्त्रों की इस मान्यता को वर्तमान में व्यापारिक रूप दे दिया गया है जिसके कारण अक्षय तृतीया के मूल उद्देश्य से हटकर लोग खरीदारी में लगे रहते हैं। वास्तव में यह वस्तु खरीदने का दिन नहीं है। वस्तु की खरीदारी में आपका संचित धन खर्च होता है

। “न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्। 
न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गङग्या समम्।।” 

मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत पुष्प दीप आदि द्वारा भगवान विष्णु की आराधना करने से विष्णु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा सँतान भी अक्षय बनी रहती है इस दिन दीन दुःखीयोँ की सेवा करना,वस्त्रादि का दान करना ओर शुभ कर्मोँ की ओर अग्रसर रहते हुए मन वचन ओर अपने कर्म से अपने मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है कलियुग के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करके दान अवश्य करना चाहिए|ऐसा करने से निश्चय ही अगले जन्म मेँ समृद्धि ऐश्वर्य व सुख की प्राप्ति होती है

दान को वैज्ञानिक तर्कों में उर्जा के रूपांतरण से जोड़ कर देखा जा सकता है।दान करने से जाने-अनजाने हुए पापों का बोझ हल्का होता है और पुण्य की पूंजी बढ़ती है। अक्षय तृतीया के विषय में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान खर्च नहीं होता है, यानी आप जितना दान करते हैं उससे कई गुणा आपके अलौकिक कोष में जमा हो जाता है।

क्या करें दान

अक्षय तृतीया को पवित्र तिथी माना गया है इस दिन गँगा यमुना आदि पवित्र नदियोँ मेँ स्नान करके श्रद्धा भाव से अपने सामर्थ्य के अनुसार जल,अनाज,गन्ना,दही,सत्तू,फल,सुराही,हाथ से बने पँखे वस्त्रादि का दान करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है।

दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए यह दिवस सर्वश्रेष्ठ है।

धन के इच्छुक लोगों को-ब्राहमण पूजा करते हुये दानादि शुभ कर्म करने चाहिए व गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए, अक्षय तृतीया के दिन मंत्र साधना भी अक्षय फल प्रदान करती है अक्षय तृतीया के दिन माँ लक्ष्मी सहित व्बिष्णु जी व देवी शक्ति सहित शिव की पूजा करनी चाहिए, विशेष तौर पर गणपति की पूजा घर में धन वैभव ले कर आती है, पूजा के समय घर पर यन्त्र स्थापित करना चाहिए जो आयु आरोग्य और धन प्रदान करें,

कुछ प्रयोग:-

(1) कार्य में सफलता हेतु

श्वेतार्क या स्फटिक के गणपति जी की स्थापना और पूजन करना चाहिए। यदि काम बनते बनते बिगड़ जाते हैं या मन्ज़िल तक पहुँच कर हाथ से निकल जाते हैं तो किसी विद्वान ब्राह्मण से श्वेतार्क का ताबीज़ बनवा कर सिद्ध करवा कर पहनना चाहिए।

(2) लक्ष्मी प्राप्ति हेतु

(क)-ग्रंथों में लक्ष्मी, यश- कीर्ति की प्राप्ति उपाय के रूप में कई उपाय मिलते हैं। लक्ष्मी गायत्री मंत्र का निरंतर जाप भी इष्टप्रद है।

'महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च
धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।'
कमल गट्टे की माला से कम से कम 11 माला जप करें।

(ख) माता लक्ष्मी जी की प्रतिमा या चित्र को ताम्बे की बड़ी थाली में स्थापित कर पूजना चाहिए, देवी को धूप दीप, नवैद्य,पंचामृत व दक्षिणा अर्पित करें, उत्तर दिशा की ओर मुख रख कर मंत्र का जाप करें, 9 माला मंत्र जाप 21 दिन करना चाहिए, लाल रंग के आसन पर बैठ कर ही जाप करें, खीर का प्रसाद चढ़ाएं व बाँटें, देवी को नारियल व पुष्प माला अर्पित करें
मंत्र-

ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा:।

(ग) चांदी की एक छोटी सी ढक्कन वाली डिबिया लें। इसमें नागकेसर व शहद भरकर शुक्ल पक्ष के शुक्रवार की रात को या अन्य किसी शुभ मुहूर्त में अपने गल्ले या तिजोरी में रख दें। आपकी धन में अचानक वृद्धि होने लगेगी। - नागकेसर के फूल लेकर शुक्रवार के दिन पूजन के बाद एक कपड़े में लपेटकर अपनी दुकान के गल्ले या अपने ऑफिस के केश बॉक्स में रखें तो धन की आवक कभी कम नहीं होगी। 

(घ) यदि आपके व्यवसाय में निरन्तर गिरावट आ रही है, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार को पीले कपड़े में काली हल्दी, 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र, चांदी का सिक्का व 11 अभिमंत्रित धनदायक कौड़ियां बांधकर 108 बार
ऊँ नमो भगवते वासुदेव नमः
का जाप कर धन रखने के स्थान पर रखने से व्यवसाय में प्रगतिशीलता आ जाती है।

( ङ) अक्षय तृतीया पर एक लाल कपड़े में मोती शंख , गोमती चक्र, लघु नारियल, पीली कौड़ी और चाँदी के सिक्के का माँ लक्ष्मी के सामने पूजन कर 21 पाठ  श्री सूक्त का करे और पोटली बना कर मन्दिर में स्थापित कर दें। पोटली खोले बिना नित्य ऊपर से ही धूप दीप करें। थोड़े ही दिनों में आर्थिक समस्या समाप्त होने लगेगी।

(3) सियार सिंगी से आकस्मिक धन प्राप्ति

यदि आपके पास सियार सिंगी है और आपको कुछ प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल रहा तो अक्षय तीज की शाम माँ महालक्ष्मी का यथासम्भव पूजन कर चाँदी की प्लेट या सिक्के पर या फिर भोज पत्र पर केसर की स्याही और चमेली की कलम से निम्न यंत्र का निर्माण करें 

____________
l६६ l ७७ l३३ ।
l४४ l६६  l४४ ।
l७७ l ४४ l७७ ।
------------

धूप दीप गंगाजल शहद फल फूल अक्षत चढ़ा कर देवी के यन्त्र को प्रतिष्ठित करें,

ॐ श्रीं श्रियै नमः ।झटिति लक्ष्मी देहि देहि स्वाहा।

मन्त्र का कम से कम 5 माला जप करें।
फिर सियार सिंगी के करीब 1/2 से 1 इंच बाल काट कर इस यंत्र पर रखें। इस पर सिंदूर और 11 अक्षत चढ़ाएं। इस भोजपत्र को मोड़कर एक पुड़िया बना लें और सामर्थ्यनुसार 50,100 या 500 के नोट में रख कर उसकी भी पुड़िया बना लें।
इसे आप अपने पर्स तिजोरी गल्ले आदि में रखें और रोज ऊपर से ही धुप दें।
ये प्रयोग निश्चित रूप से आकस्मिक धन लाभ करवाता है।

(4) आरोग्य और संतान हेतु

आरोग्य और सन्तान प्राप्ति हेतु भग७वान शिव का रुद्राभिषेक करवाएं। यदि सम्भव न हो तो रोगी के परिवार जन शिव सहस्त्रनाम का पाठ करें और रोगी स्वयं जलाभिषेक करे। निसन्तान दम्पति में पति साउच्चारण सहस्त्रनाम पाठ करे और पत्नी लिंग पर अटूट जलाभिषेक करे।

(5) अभिनय कला संगीत में सफलता हेतु

मातंगी माता का मंत्र स्फटिक की माला से बारह माला करना चाहिए

‘ऊँ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:’

(6) पारिवारिक सुख शांति उन्नति हेतु

माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करके घर- परिवार में वैभव की प्रतिष्ठा की जा सकती है। प्रातः काल, स्नानादि व तुलसी सेवन करके

'हरिजागरणं प्रातः स्नानं तुलसीसेवनम्। 
उद्यापनं दीपदानं व्रतान्येतानि कार्तिके॥'

इस मंत्र के साथ दीपदान करें| इसी मंत्र के द्वारा सत्यभामा ने अक्षय सुख, सौभाग्य और संपदा के साथ सर्वेश्वर को सुलभ किया था।

(7) हनुमान जी को करें प्रसन्न

मंगलवार को अक्षय तीज पड़ने से हनुमान जी के भक्तों के लिए भी ये एक विशिष्ट मौका है।
इस दिन हनुमान जी की प्रसन्नता के लिए उनके मन्दिर जाकर उनके सम्मुख आटे का 5 बत्ती का लौंग युक्त घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं। गुलाब या आक के फूल अर्पित करें। गुग्गुल की धूप जलाकर
सुन्दरकाण्ड
हनुमान चालीसा या बजरँग बाण के 108 पाठ करें।

(7) अबूझ मुहूर्त और अक्षय फलदायी होने के कारण विभिन तंत्रोक्त वस्तुओं के जागरण, पैन प्रतिष्ठा और स्थापना के लिए भी ये स्वर्णिम अवसर है।

(8) रुद्राक्ष और रुद्राक्ष माला, इन्द्राक्षी माला की प्राण प्रतिष्ठा और धारण करना भी महाफलदायि है।

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Friday, 17 April 2015

Dashrath krit Shani Stotra दशरथ कृत शनि स्तोत्र

मित्रों आज 18 अप्रैल को शनि अमावस्या है। इस सम्पूर्ण वर्ष शनि  वृच्छिक राशि में विचरण करेगा।

ढैय्या  मेष और सिंह --- इस दोनों राशि पर शनि का ढैया वर्षभर रहेगा।

मेष राशि वालो को शनि का ढैया स्वर्ण पाद से रोग,पीड़ाकारक कारोबारीक मानसिक परेशानी बढ़ाने वाला होगा।

सिंह राशि वालो को  ढैया ताम्र पाद से रहेगा,श्रम संघर्ष से लाभ प्राप्त होगा।

साढ़े साती  तुला,वृच्छिक,धनु---
इन राशि वालो को शनि की साढ़ेसाती रहेगी।

तुला राशि वालो को रजत पाद से शनि की उतरती साढ़ेसाती व्यापार में लाभदायक सिद्ध होगी।

वृच्छिक राशि वालो को मध्यकालीन साढ़ेसाती लोहे के पाये होने से शारीरिक कष्ट व्यर्थ की भागदौड़ तथा मन को अशांत करने वाली होगी।

धनु राशि वालो को शनि की चढ़ती साढ़ेसाती ताम्र पाद से लाभदायक सिद्ध होगी।

यहाँ ध्यान देने की आवश्यकता है की इस वर्ष जिन राशि वालो को शनि साढ़ेसाती व  ढैया हो ,किन्तु उनकी व्यक्तिगत जन्म कुंडली में शनि श्रेष्ठ स्थान पर स्थित हो तथा दशा अंतर्दशा श्रेष्ठ चल रही हो उन जातको को शनि श्रेष्ठ फल प्रधान करेगा तथा अशुभ फल कम देगा।

जन्म कुंडली में चन्द्र तथा शनि अशुभ ग्रहो से युक्त अशुभ स्थानो पर हो तो शनि साढ़ेसाती एव  ढैया पीड़ा,चिन्ताकारक,धन हानि,रोज़गार में कमी,झगड़ा,धन खर्च,व्यर्थ कलह,पशु पीड़ा आदि अशुभ फलदायक होता है.

           
स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत है कि छाया सुत शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य से प्रार्थना की कि मै ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ जिसे आज तक किसी ने प्राप्त न किया हो, आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो और मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये चाहे वह देव,असुर,दानव, ही क्यों न हो | शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न हुए और उत्तर दिया कि इसके लिये उसे काशी जा कर भगवान शंकर कि आराधना करनी चाहिए | शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया और शिव ने प्रसन्न हो कर शनि को ग्रहत्व प्रदान कर नव ग्रह मंडल में स्थान दिया |

शनि की क्रूर दृष्टि का रहस्य

ब्रह्म पुराण के अनुसार शनि देव बाल्य अवस्था से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे |हर समय उन के ही ध्यान में मग्न रहते थे | विवाह योग्य आयु होने पर  इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से संपन्न हुआ |इनकी पत्नी भी साध्वी एवम तेजस्विनी थी | एक  बार वह पुत्र प्राप्ति की कामना से शनिदेव के निकट आई | उस समय शनि ध्यान मग्न थे अतः उन्हों ने अपनी पत्नी की ओर दृष्टिपात तक नहीं किया |लंबी प्रतीक्षा के बाद भी जब शनि का ध्यान भंग नहीं हुआ तो  वह ऋतुकाल निष्फल हो जाने के कारण से क्रोधित हो गयी और शनि को शाप दे दिया कि – अब से तुम जिस पर भी दृष्टिपात करोगे वह नष्ट हो जाएगा |तभी से शनि कि दृष्टि को क्रूर व अशुभ समझा जाता है |

शनि भी सदैव अपनी दृष्टि नीचे ही रखते हैं ताकि उनके द्वारा किसी का अनिष्ट न हो |फलित ज्योतिष में भी शनि कि दृष्टि को अमंगलकारी कहा गया है |

  ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी शनि कि क्रूर  दृष्टि का वर्णन है | गौरी नंदन गणेश के जन्मोत्सव पर शनि बालक के दर्शन कि अभिलाषा से गए |मस्तक झुका कर बंद नेत्रों से माता पार्वती के चरणों में प्रणाम किया , शिशु गणेश माता कि गोद में ही थे | माँ पार्वती ने शनि को आशीष देते हुए प्रश्न किया ,” हे शनि देव ! आप गणेश को देख नहीं रहे हो इसका क्या कारण है |” शनि ने उत्तर दिया –“ माता ! मेरी सहधर्मिणी का शाप है कि मैं जिसे भी देखूंगा उसका अनिष्ट होगा ,इसलिए मैं अपनी दृष्टि नीचे ही रखता हूँ | “ पार्वती ने सत्य को जान कर भी दैववश शनि को बालक को देखने का आदेश दिया | धर्म को साक्षी मान कर शनि ने वाम नेत्र के कोने से बालक गणेश पर दृष्टिपात किया | शनि दृष्टि पड़ते ही गणेश का मस्तक धड से अलग हो कर गोलोक में चला गया | बाद में श्री हरि ने एक गज शिशु का मस्तक गणेश के धड से जोड़ा और उस में प्राणों का संचार किया |तभी से गणेश गजानन नाम से  प्रसिद्ध हुए |

पुराणों में शनि का स्वरूप एवम प्रकृति  

मत्स्य पुराण के अनुसार शनि कि कान्ति इन्द्रनील मणि के समान है| शनि गिध्द पर सवार हाथ में धनुष बाण ,त्रिशूल व व्र मुद्रा से युक्त हैं |पद्म पुराण में शनि कि स्तुति में  दशरथ  उनकी प्रकृति का चित्रण करते हैं कि शनि का शरीर कंकाल के समान है,पेट पीठ से सटा हुआ है, शरीर का ढांचा विस्तृत है जिस पर मोटे रोएं स्थित हैं | शनि के नेत्र भीतर को धसें हैं तथा दृष्टि नीचे कि और है |शनि तपस्वी हैं व मंद गति हैं | भूख से व्याकुल व अतृप्त रहते हैं |शनि का वर्ण कृष्ण के समान नील है |

ज्योतिष शास्त्र में शनि

प्रमुख ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शनि दुष्ट ,क्रोधी, आलसी,लंगड़ा,काले वर्ण का ,विकराल,दीर्घ व कृशकाय शरीर का है |द्रष्टि नीचे ही रहती है , नेत्र पीले व  गढ्ढे दार हैं |शरीर के अंग व रोम कठोर तथा नख व दांत मोटे हैं |शनि वात प्रकृति का तमोगुणी ग्रह है |
शनि का रथ लोहे का है |वाहन गिद्ध है |सामान्यतः यह एक राशि में 30 मास तक भ्रमणशील रहता है तथा सम्पूर्ण राशि चक्र को लगभग 30 वर्ष में पूर्ण करता है | इस मंद गति के कारण ही इसका नाम शनैश्चर व मंद प्रसिद्ध है |
पद्म पुराण के अनुसार शनि जातक कि जन्म राशि से पहले ,दूसरे,बारहवें,चौथे व आठवें स्थान पर आने पर कष्ट देता है |

  ज्योतिष शास्त्र में शनि  को पाप व अशुभ  ग्रह माना गया है | ग्रह मंडलमें शनि को सेवक का पद प्राप्त है| यह मकर और कुम्भ  राशियों का स्वामी है |यह तुला   राशि में उच्च का तथा मेष राशि  में नीच का माना जाता है | कुम्भ इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है |शनि  अपने स्थान से तीसरे, सातवें,दसवें  स्थानको पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को अशुभकारक कहा गया है |जनमकुंडली मेंशनि  षष्ट ,अष्टम  भाव का कारक होता है |शनि   की सूर्य -चन्द्र –मंगल सेशत्रुता , शुक्र  – बुध से मैत्री और गुरु से समता है | यह स्व ,मूलत्रिकोण व उच्च,मित्र  राशि –नवांश  में ,शनिवार  में,दक्षिणायनमें , दिन के अंत में ,कृष्ण पक्ष में ,वक्री होने पर  ,वर्गोत्तम नवमांश में बलवान व शुभकारक होता है |

प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथोंके अनुसार शनि लोहा ,मशीनरी ,तेल,काले पदार्थ,रोग, शत्रु,दुःख ,स्नायु ,मृत्यु ,भैंस ,वात रोग ,कृपणता ,अभाव ,लोभ ,एकांत, मजदूरी, ठेकेदारी ,अँधेरा ,निराशा ,आलस्य ,जड़ता ,अपमान ,चमड़ा, पुराने पदार्थ ,कबाडी ,आयु ,लकड़ी ,तारकोल ,पिशाच बाधा ,संधि रोग ,प्रिंटिंग प्रैस ,कोयला ,पुरातत्व विभाग इत्यादि का कारक है |

शनि शांति के उपाय

घर में पारद और स्फटिक शिवलिंग का  विधानपूर्वक पूजा अर्चना कर, रूद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए।

सुंदरकाण्ड का पाठ एवं हनुमान उपासना, संकटमोचन का पाठ करें।

हनुमान चालीसा, शनि चालीसा और शनैश्चर देव के मंत्रों का पाठ करें।

शनि जयंती पर, शनि मंदिर जाकर, शनिदेव का अभिषेक कर दर्शन करें।

ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: के 23,000 जप करें फिर 27 दिन तक शनि स्तोत्र के चार पाठ रोज करें।

शनिवार को सायंकाल पीपल के पेड के नीचे  तेल का दीपक जलाएं।

घर के मुख्य द्वार पर, काले घोडे की नाल, शनिवार के दिन लगावें।

काले तिल, ऊनी वस्त्र, कंबल, चमडे के जूते, तिल का तेल, उडद, लोहा, काली गाय, भैंस, कस्तूरी, स्वर्ण, तांबा आदि का दान करें।

घोडे की नाल अथवा नाव की कील का छल्ला बनवाकर मघ्यमा अंगुली में पहनें।

कडवे तेल में परछाई देखकर, उसे अपने ऊपर सात बार उसारकर दान करें, पहना हुआ वस्त्र भी दान दे दें, पैसा या आभूषण आदि नहीं।
शनि विग्रह के चरणों का दर्शन करें, मुख के दर्शन से बचें।

शनिव्रत : श्रावण मास के शुक्ल पक्ष से, शनिव्रत आरंभ करें, 33 व्रत करने चाहिएँ, तत्पश्चात् उद्यापन करके, दान करे

नीचे प्रस्तुत है पूर्ण दशरथकृत शनि स्तोत्र

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशनि-स्तोत्र-मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, सौरिर्देवता, शं बीजम्, निः शक्तिः, कृष्णवर्णेति कीलकम्, धर्मार्थ-काम-मोक्षात्मक-चतुर्विध-पुरुषार्थ-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

कर-न्यासः-

शनैश्चराय अंगुष्ठाभ्यां नमः। मन्दगतये तर्जनीभ्यां नमः। अधोक्षजाय मध्यमाभ्यां नमः। कृष्णांगाय अनामिकाभ्यां नमः। शुष्कोदराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। छायात्मजाय करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि-न्यासः-

शनैश्चराय हृदयाय नमः। मन्दगतये शिरसे स्वाहा। अधोक्षजाय शिखायै वषट्। कृष्णांगाय कवचाय हुम्। शुष्कोदराय नेत्र-त्रयाय वौषट्। छायात्मजाय अस्त्राय फट्।

दिग्बन्धनः-
“ॐ भूर्भुवः स्वः”

ध्यानः-
नीलद्युतिं शूलधरं किरीटिनं गृध्रस्थितं त्रासकरं धनुर्धरम्।
चतुर्भुजं सूर्यसुतं प्रशान्तं वन्दे सदाभीष्टकरं वरेण्यम्।।

रघुवंशेषु विख्यातो राजा दशरथः पुरा।
चक्रवर्ती स विज्ञेयः सप्तदीपाधिपोऽभवत्।।१
कृत्तिकान्ते शनिंज्ञात्वा दैवज्ञैर्ज्ञापितो हि सः।
रोहिणीं भेदयित्वातु शनिर्यास्यति साम्प्रतं।।२
शकटं भेद्यमित्युक्तं सुराऽसुरभयंकरम्।
द्वासधाब्दं तु भविष्यति सुदारुणम्।।३
एतच्छ्रुत्वा तु तद्वाक्यं मन्त्रिभिः सह पार्थिवः।
व्याकुलं च जगद्दृष्टवा पौर-जानपदादिकम्।।४
ब्रुवन्ति सर्वलोकाश्च भयमेतत्समागतम्।
देशाश्च नगर ग्रामा भयभीतः समागताः।।५
पप्रच्छ प्रयतोराजा वसिष्ठ प्रमुखान् द्विजान्।
समाधानं किमत्राऽस्ति ब्रूहि मे द्विजसत्तमः।।६
प्राजापत्ये तु नक्षत्रे तस्मिन् भिन्नेकुतः प्रजाः।
अयं योगोह्यसाध्यश्च ब्रह्म-शक्रादिभिः सुरैः।।७
तदा सञ्चिन्त्य मनसा साहसं परमं ययौ।
समाधाय धनुर्दिव्यं दिव्यायुधसमन्वितम्।।८
रथमारुह्य वेगेन गतो नक्षत्रमण्डलम्।
त्रिलक्षयोजनं स्थानं चन्द्रस्योपरिसंस्थिताम्।।९
रोहिणीपृष्ठमासाद्य स्थितो राजा महाबलः।
रथेतुकाञ्चने दिव्ये मणिरत्नविभूषिते।।१०
हंसवर्नहयैर्युक्ते महाकेतु समुच्छिते।
दीप्यमानो महारत्नैः किरीटमुकुटोज्वलैः।।११
ब्यराजत तदाकाशे द्वितीये इव भास्करः।
आकर्णचापमाकृष्य सहस्त्रं नियोजितम्।।१२
कृत्तिकान्तं शनिर्ज्ञात्वा प्रदिशतांच रोहिणीम्।
दृष्टवा दशरथं चाग्रेतस्थौतु भृकुटीमुखः।।१३
संहारास्त्रं शनिर्दृष्टवा सुराऽसुरनिषूदनम्।
प्रहस्य च भयात् सौरिरिदं वचनमब्रवीत्।।१४

शनिउवाच-
पौरुषं तव राजेन्द्र ! मया दृष्टं न कस्यचित्।
देवासुरामनुष्याशऽच सिद्ध-विद्याधरोरगाः।।१५
मयाविलोकिताः सर्वेभयं गच्छन्ति तत्क्षणात्।
तुष्टोऽहं तव राजेन्द्र ! तपसापौरुषेण च।।१६
वरं ब्रूहि प्रदास्यामि स्वेच्छया रघुनन्दनः !

दशरथ उवाच-
प्रसन्नोयदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः।।१७
रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन्।
सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी।।१८
याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं।
एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम्।।१९
प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा।
पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ! ।।२०
प्रार्थयामास हृष्टात्मा वरमन्यं शनिं तदा।
नभेत्तव्यं न भेत्तव्यं त्वया भास्करनन्दन।।२१
द्वादशाब्दं तु दुर्भिक्षं न कर्तव्यं कदाचन।
कीर्तिरषामदीया च त्रैलोक्ये तु भविष्यति।।२२
एवं वरं तु सम्प्राप्य हृष्टरोमा स पार्थिवः।
रथोपरिधनुः स्थाप्यभूत्वा चैव कृताञ्जलिः।।२३
ध्यात्वा सरस्वती देवीं गणनाथं विनायकम्।
राजा दशरथः स्तोत्रं सौरेरिदमथाऽकरोत्।।२४

दशरथकृत शनि स्तोत्र
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।२५।।
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।२६
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।२७
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।२८
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ।।२९
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ।।३०
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।३१
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।३२
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।३३
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ।।३४
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः।
अब्रवीच्च शनिर्वाक्यं हृष्टरोमा च पार्थिवः।।३५
तुष्टोऽहं तव राजेन्द्र ! स्तोत्रेणाऽनेन सुव्रत।
एवं वरं प्रदास्यामि यत्ते मनसि वर्तते।।३६
दशरथ उवाच-
प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम्।
अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित्।।३७
प्रसादं कुरु मे सौरे ! वरोऽयं मे महेप्सितः।
शनि उवाच-
अदेयस्तु वरौऽस्माकं तुष्टोऽहं च ददामि ते।।३८
त्वयाप्रोक्तं च मे स्तोत्रं ये पठिष्यन्ति मानवाः।
देवऽसुर-मनुष्याश्च सिद्ध विद्याधरोरगा।।३९
न तेषां बाधते पीडा मत्कृता वै कदाचन।
मृत्युस्थाने चतुर्थे वा जन्म-व्यय-द्वितीयगे।।४०
गोचरे जन्मकाले वा दशास्वन्तर्दशासु च।
यः पठेद् द्वि-त्रिसन्ध्यं वा शुचिर्भूत्वा समाहितः।।४१
न तस्य जायते पीडा कृता वै ममनिश्चितम्।
प्रतिमा लोहजां कृत्वा मम राजन् चतुर्भुजाम्।।४२
वरदां च धनुः-शूल-बाणांकितकरां शुभाम्।
आयुतमेकजप्यं च तद्दशांशेन होमतः।।४३
कृष्णैस्तिलैः शमीपत्रैर्धृत्वाक्तैर्नीलपंकजैः।
पायससंशर्करायुक्तं घृतमिश्रं च होमयेत्।।४४
ब्राह्मणान्भोजयेत्तत्र स्वशक्तया घृत-पायसैः।
तैले वा तेलराशौ वा प्रत्यक्ष व यथाविधिः।।४५
पूजनं चैव मन्त्रेण कुंकुमाद्यं च लेपयेत्।
नील्या वा कृष्णतुलसी शमीपत्रादिभिः शुभैः।।४६
दद्यान्मे प्रीतये यस्तु कृष्णवस्त्रादिकं शुभम्।
धेनुं वा वृषभं चापि सवत्सां च पयस्विनीम्।।४७
एवं विशेषपूजां च मद्वारे कुरुते नृप !
मन्त्रोद्धारविशेषेण स्तोत्रेणऽनेन पूजयेत्।।४८
पूजयित्वा जपेत्स्तोत्रं भूत्वा चैव कृताञ्जलिः।
तस्य पीडां न चैवऽहं करिष्यामि कदाचन्।।४९
रक्षामि सततं तस्य पीडां चान्यग्रहस्य च।
अनेनैव प्रकारेण पीडामुक्तं जगद्भवेत्।।५०

पद्म पुराण में वर्णित शनि के  दशरथ को दिए गए वचन के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक शनि की लोह प्रतिमा बनवा कर शमी पत्रों से उपरोक्त स्तोत्र द्वारा पूजन करके तिल ,काले उडद व लोहे का दान प्रतिमा सहित करता है तथा नित्य विशेषतः शनिवार को भक्ति पूर्वक इस स्तोत्र का जाप करता है उसे दशा या गोचर में कभी शनि कृत पीड़ा नहीं होगी और शनि द्वारा सदैव उसकी रक्षा की जायेगी |

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।।जय श्री राम।।
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Jyotish and Tantra : शनि अमावस्या और शनि मन्त्र पर विशेष लेख/ Shani amavasya and special shani mantras
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Saturday, 11 April 2015

रत्न वनस्पति जड़ी Use Herbs substitute inplace of costly gems

रत्न वनस्पति जड़ी :

मित्रों
आज अपनी एक पुरानी पोस्ट फिर से शेयर कर रहा हूँ जो मैंने वर्ष 2013 में इसी पेज पर दो भागों में लिखी थी, यहाँ दोनों भाग एक साथ प्रस्तुत हैं।
कारण की आज सुबह अख़बार में आधे पेज का इश्तहार देखा जो किसी रतन बेचने वाले ग्रुप का था।
इश्तेहार हरा टोपाज बेचने के लिए था इसलिए उसमे  बुध गृह के प्रभाव दुष्प्रभाव रत्न और उपरत्न के बारे में लिखा था। कीमत 2990/- मात्र।
किन्तु जेमोलॉजी यानि रत्नशास्त्र की मेरी जानकारी के अनुसार टोपाज प्राकृतिक रूप से हरे रंग में पैदा ही नहीं होता सफ़ेद पीला ही अधिकमिलते हैं जिन्हें केमिकल ट्रीटमेंट द्वारा विभिन्न रंगों में तैयार कर बेचा जाता है। इंटरनेट और कुछ जानकार मित्रों से भी ये कन्फर्म किया।
साथ ही टोपाज बताकर दूसरे सिंथेटिक टोपाज या उपरत्न बेचे जाते हैं क्योंकि प्राकृतिक रूप से उतपन्न टोपाज भी महंगा है।
यानि रत्न के नाम पर पूर्ण ठगी और विश्वासघात।
निचे ये चित्र इसीलिए डाला है की आप भी खेल समझ सकें जैसे सारे रत्न अलग रंगों में दिख रहे हैं पर वास्तव में सब एक सिंथेटिक पत्थर से बने हअं और अलग अलग आकार में घिस कर विविध रंगों में रंग दिए गए हैं।
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 पुरानी पोस्ट :-
जैसा कि मैँने आपको अपनी पिछली पोस्ट मेँ बताया कि अत्यधिक महँगे रत्नोँ के स्थान पर आप कुछ वनस्पतियोँ की जड़ धारण कर वैसा ही लाभ उठा सकते हैँ। ये वनस्पतियाँ हजारोँ रूपयोँ क रत्नोँ की जगह बेहद कम में बाज़ार से  खरीद सकते हैँ या यदि आप स्वयँ इन्हेँ पहचानते हैँ तो विधिपूर्वक इन्हे पेड़ से ले आयेँ।
रत्न वनस्पति जड़ी को धारण करने से पूर्व उसे पहले गंगाजल अथवा कच्चे दूध से स्नान करायें.उसके बाद एक लकड़ी के पाटे/ पटरे या बाजोट पर जिस रंग का रत्न हो,उसी रंग के कपडे का टुकडा एक प्लेट में बिछाकर रत्न को उस पर स्थापित करें. शुद्ध घी का दीपक व धूप जलाकर रत्न के स्वामी ग्रह के मन्त्र का अधिकाधिक यथासंभव संख्या में या कम से कम 108 जाप करने के बाद उस रत्न को उसी वस्त्र मेँ सिलकर तथा उसी रँग के धागे मेँ पिरोकर ताबीज़ के रूप मेँ गले या भुजा पर धारण करें.
निम्न तालिका से आप सम्बन्धित रत्न का अधिष्ठाता ग्रह, रत्न वनस्पती जड़ी, रँग, उसका मन्त्र तथा उसे धारण करने के दिन तथा समय के बारे में जानकारीप्राप्त कर सकते हैं.
1. ग्रह- सूर्य, रत्न- माणिक्य, वनस्पति- बिल्व/ बेल, वस्त्र का रँग- लाल, दिन- रविवार, पूजन व धारण समय- प्रातःकाल, बीजमँत्र- ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रौँ सः सूर्याय नम:। 


2. चँद्र, मोती, खिरनी, सफेद, सोमवार, प्रातःकाल, ॐ श्राँ श्रीँ श्रौँ सः चँद्रमसे नम:। 


3. मंगल, मूँगा, अनँतमूल, लाल या केसरिया, मँगलवार, प्रातःकाल, ॐ क्राँ क्रीँ क्रौँ सः भौमाय नम:। 


4. बुध, पन्ना, विधारा, हरा, बुधवार, प्रातःकाल, ॐ ब्राँ ब्रीँ ब्रौँ सः बुधाय नम:। 


5. बृहस्पति / गुरू, पुखराज, केला, गुरूवार, पीला, प्रातःकाल, ॐ ग्राँ ग्रीँ ग्रौँ सः गुरुवे नम:। 

6. शुक्र, हीरा, मजीठ या ऐरँड, शुक्रवार, चाँदीजैसा या सफेद, प्रातःकाल, ॐ द्राँ द्रीँ द्रौँ सः शुक्राय नम:।


7. शनि, नीलम, धतूरा/ बिच्छूघास, शनिवार, नीला, सायँकाल, ॐ प्राँ प्रीँ प्रौँ सः शनैश्चराय नमः।


8. राहु, गोमेद, सफेद चँदन/ अश्वगँधा, भूरा, गुरूवार, सायँकाल, ॐ भ्राँ भ्रीँ भ्रौँ सः राहुवे नम:।


9. केतु, लहसुनिया, कुश बरगद, सलेटी ग्रे, गुरुवार, सायँकाल, ॐ स्त्राँ स्त्रीँ स्त्रौँ सः केतवे नम:।


रत्न वनस्पति जड़ी सम्बँधित कुछ जिज्ञासाओँ के उत्तर:

मित्रोँ रत्न जड़ी की पोस्ट के बाद मेरे पास इससे संबंधित अनेको फोन और सौ से अधिक मैसेज आ चुके हैँ। इसी संबँध मेँ आपको बताना चाहूँगा कि

 1. आपको इसके लिए अधिक परेशान होने की आवश्यक्ता नहीँ है। सर्वप्रथम अपने शहर मेँ इन्हेँ प्राकृतिक रूप से ढूँढने का प्रयास करेँ यदि न मिले तो पंसारी से खरीद लेँ। अगर वहाँ भी न मिले तो नीचे लिखे नंबर पर फ़ोन कर आप अपनी जड़ी का बना बनाया मँत्र सिद्ध ताबीज़ मँगवा सकते हैँ। 

2. मात्रा या क्वाँटिटी? 

आपको ये बहुत ज्यादा नहीँ चाहिए, बस 1 या डेढ़ इँच लँबा 1 टुकड़ा जो आपकी किसी उँगली की मोटाई के बराबर हो जिसे आप रत्न के स्वामी ग्रह के रँग के वस्त्र मेँ सिलकर तावीज़ बना कर धारण कर सकेँ।

 3. कितनी कारगर है? 
अगर वाकई आपको उक्त रत्न की आवश्यक्ताहै तो ये जड़ी उसकी 75 -80% कमी पूरी कर देँगी। इसे पहनकर आपका एक प्रकार का ट्रायल भी हो जाएगा कि रत्न आप पर असर करेगा या नही। यदि जड़ी फायदा देगी तो रत्न अवश्य फायदा देगा। फायदा मिलने पर आप रत्न खरीद कर पहन सकते हैँ अन्यथा अक्सर लोग ऐसा कहते देखे गये हैँ कि हजारोँ रूपये का रत्न लिया पर कोई फायदा नहीँ हुआ। 

4. दुष्प्रभाव :- 

मित्रोँ प्रायः रत्नोँ के दुष्प्रभाव भी सुने जाते हैँ कि पहनते ही एक्सिडेँट हुआ, बीमारी हो गई, धँधा मँदा हो गया या गृह क्लेश शुरू हो गया। किँतु वनस्पति जड़ी इनसे पूर्णतः मुक्त होती है तथा इस प्रकार के कोई दुष्प्रभाव नहीँ देती, यदि आप गलती से भी अवाँछित जड़ी पहन लेँ तो वो ग्रह के दुष्प्रभावोँ की जगह अपना औषधीय लाभ देने लगती है। 

5. दोष :-

 रत्न मेँ अनेक दोष हो सकते हैँ पर जड़ी मेँ कोई दोष नहीँ होता बस जड़ी असली होनी चाहिए।

 6. पूर्ण लाभ कैसे मिले:- 

मित्रोँ यदि आप जड़ी का पूर्ण लाभ लेना चाहते हैँ तो ध्यान रखेँ कि जड़ी पूर्णतः वैदिक विधि द्वारा शुद्ध रूप से प्राप्त की गई हो। विधि पूर्वक न निकालने पर ये अशुद्ध हो जाती है, इसका प्रभाव काफी कम हो जाता है और जातक या धारण करने वाले को जड़ी का पूर्ण लाभ नहीँ मिलता। मित्रोँ ये जड़ी आप स्वयँ विधि पूर्वक निकालेँ तो सर्वोत्तम न मिलने पर ही बाज़ार  से लेँ। 

यदि किसी भी प्रकार न मिले तो नीचे लिखे नंबर पर फोन कर आप अपनी जड़ी का बना बनाया मँत्र सिद्ध ताबीज़ घर बैठे मँगवा सकते हैँ। 

अन्य किसी जानकारी समस्या समाधान, कुंडली विश्लेषण हेतु संपर्क कर हैं।  
 ।।जय श्री राम।।

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