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Tuesday, 24 November 2015

Kaudi se dhan labh कौड़ी कराएगी धन लाभ (कार्तिक पूर्णिमा विशेष प्रयोग)

कार्तिक पूर्णिमा पर कौड़ी कराएगी धन लाभ

सभी मित्रों को कार्तिक पूर्णिमा की शुभकामनायें।

मित्रों
आज एक छोटा सा उपाय दे रहा हूँ, जो बेहद सरल है और आपको वर्ष भर लाभ देगा।

आज शाम को प्रदोष काल में अर्थात जब न दिन हो न रात लगभग उस समय ये प्रयोग शुरू करना है। इसके लिए

शाम में एक लकड़ी की चौकी पर एक लाल वस्त्र बिछाएं उस पर हल्दी से रंगे हुए सवा मुट्ठी पीले चावलों की एक ढेरी बनाएं।
ढेरी पर सर्वप्रथम एक सुपारी को मौली या कलावा लपेट कर भगवान गणेश के रूप में स्थापित कर उनका पंचोपचार पूजन करें।

ॐ गं गणपतये नमः।

मन्त्र का जप करें।

फिर 11 लक्ष्मीदायक कौड़ियों कोस्थापित करें। माँ महालक्ष्मी का स्वरूप मानकर धूप दीप नैवेद्य से उनका भी पंचोपचार पूजन करें।
साथ में दक्षिणा स्वरूप 5 या 10 रूपये का सिक्का रखें।
फिर निम्न मन्त्र का यथासम्भव अधिकाधिक जप रुद्राक्ष या स्फटिक माला से करें

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्मयै नमः।

पूजन के पश्चात् लाल कपड़े को लपेट कर पोटली बनाकर अपने धन स्थान या अलमारी में रख दें और फिर कभी न छेड़ें।

अगले वर्ष इन्हें इस कामना के साथ जल में प्रवाहित कर दें कि ये आपके समस्त दुःख , दरिद्र, रोग शोकादि को लेकर जा रहे हैं। और नई कौड़ियां लेकर पुनः इसी प्रकार पूजन कर रखें।

ये प्रयोग दिखने में बेहद मामूली है पर इसके लाभ बेहद आश्चर्यजनक हैं। जिन्हें आप साल भर महसूस करेंगे।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान, अथवा कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

।।जय श्री राम।।
7579400465
8909521616( whatsapp/ hike)

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Monday, 9 November 2015

Saubhagya Lakshmi yantra सौभाग्य लक्ष्मी यंत्र

मित्रों

आज आपको एक बहुत सरल प्रयोग देने जा रहा हूं जिसे करके आप वर्ष भर आर्थिक दिक्कत में नहीं पड़ेंगे यदि आप कर्ज में फंसे हूं या धन संचय नहीं होता आपके खर्च कमाई से अधिक है तो यह एक बहुत सरल प्रयोग है जिसे दीवाली की रात करके आप वर्ष पर्यंत लाभ उठा सकते है और अपनी इन समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं ।

 यह प्रयोग आप दीपावली की रात्रि में रात लगभग साढ़े 12 बजे शुरू करें इसके लिए एक बड़े साइज का भोजपत्र ले जो करीब 10 इंच लंबा और 4 से 5 इंच चौड़ा हो।

एक लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा कर उसपर एक चावल की ढेरी बनाएं और ढेरी पर एक ताम्बे की प्लेट स्थापित करें। प्लेट पर सिंदूर से स्वस्तिक चिन्ह बनाकर उस पर भोजपत्र रखें।
भोजपत्र पर गंगाजल के छींटे दें फिर अनार की कलम से नीचे दिए गए चित्र के अनुसार ही

श्रीं स्वास्तिक चिन्ह ह्रीं

अंकित करें। ये अक्षर थोड़े मोटे ही बनाएं बारीक़ और पतले नहीं।
फिर किसी चाँदी के पात्र में नागकेसर लें उसमें शहद, गोरोचन , केसर मिला लें।

अब इस नागकेसर मिश्रण को भोजपत्र पर लिखे हुए अक्षरों पर इस प्रकार चिपका दें जिससे सिंदूर से लिखे अक्षर न दिखें और रँगे
हुए नागकेसर से ही लिखा हुआ प्रतीत हो।
इस यंत्र को गंगाजल व् पंचामृत के छींटे दें और धूप दीप रक्त पुष्प से पूजन करें और निम्न मन्त्र की
कम से कम 5 माला जप करें , सम्भव हो तो 11 या 21 माला करें तो अति उत्तम।

मन्त्र:-
      ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

माँ को खीर अथवा सफेद बर्फी का भोग लगायें।

अगले दिन प्रातः इस यंत्र को चाहे तो अपनी तिजोरी/ अलमारी में रख लें अथवा मन्दिर में स्थापित करें।
नित्यप्रति एक माला मन्त्र जप करते रहें और माँ लक्ष्मी की कृपा का लाभ उठायें।

अच्छा हो यदि आप इसे फ्रेम करवा लें ताकि नागकेसर बिखरें नहीं।

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।।जय श्री राम।।
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Friday, 6 November 2015

Magical Tantrik herb Gunja चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा

चमत्कारी है गुंजा

तांत्रिक जड़ीबूटियां भाग -9

 मित्रों
गुंजा एक फली का बीज है। इसको  धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसकी बेल काफी कुछ मटर की तरह ही लगती है किन्तु अपेक्षाकृत मजबूत काष्ठीय तने वाली। इसे अब भी कहीं कहीं आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक सुनार इसे सोना तोलने के काम में लेते थे क्योंकि इनके प्रत्येक दाने का वजन लगभग बराबर होता है करीब 120 मिलीग्राम। ये हमारे जीवन में कितनी बसी है इसका अंदाज़ा मुहावरों और लोकोक्तियों में इसके प्रयोग से लग जाता है।

यह तंत्र शास्त्र में जितनी मशहूर है उतनी ही आयुर्वेद में भी। आयुर्वेद में श्वेत गूंजा का ही अधिक प्रयोग होता है औषध रूप में साथ ही इसके मूल का भी जो मुलैठी के समान ही स्वाद और गुण वाली होती है। इसीकारण कई लोग मुलैठी के साथ इसके मूल की भी मिलावट कर देते हैं।
वहीं रक्त गूंजा बेहद विषैली होती है और उसे खाने से उलटी दस्त पेट में मरोड़ और मृत्यु तक सम्भव है। आदिवासी क्षेत्रों में पशु पक्षी मारने और जंगम विष निर्माण में अब भी इसका प्रयोग होता है।

गुंजा की तीन प्रजातियां मिलती हैं:-

1• रक्त गुंजा: लाल काले रंग की ये प्रजाति भी तीन तरह की मिलती है जिसमे लाल और काले रंगों का अनुपात 10%, 25% और 50% तक भी मिलता है।
ये मुख्यतः तंत्र में ही प्रयोग होती है।

श्वेत गुंजा •  श्वेत गुंजा में भी एक सिरे पर कुछ कालिमा रहती है। यह आयुर्वेद और तंत्र दोनों में ही सामान रूप से प्रयुक्त होती है। ये लाल की अपेक्षा दुर्लभ होती है।

काली गुंजा: काली गुंजा दुर्लभ होती है, आयुर्वेद में भी इसके प्रयोग लगभग नहीं हैं हाँ किन्तु तंत्र प्रयोगों में ये बेहद महत्वपूर्ण है।

इन तीन के अलावा एक अन्य प्रकार की गुंजा पायी जाती है पीली गुंजा ये दुर्लभतम है क्योंकि ये कोई विशिष्ट प्रजाति नहीं है किन्तु लाल और सफ़ेद प्रजातियों में कुछ आनुवंशिक विकृति होने पर उनके बीज पीले हो जाते हैं। इस कारण पीली गूंजा कभी पूर्ण पीली तो कभी कभी लालिमा या कालिमा मिश्रित पीली भी मिलती है।

इस चमत्कारी वनस्पति गुंजा के कुछ प्रयोग:-

1• सम्मान प्रदायक :

 शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा।

2•  कारोबार में बरकत

 किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।

3"• ज्ञान-बुद्धि वर्धक :

(क) गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है।

(ख) यदि सफेद गुंजा के 11 या 21 दाने अभिमंत्रित करके विद्यार्थियों के कक्ष में उत्तर पूर्व में रख दिया जाये तो एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में लाभ होता है।

4• वर-वधू के लिए :

विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है।

5• पुत्रदाता :

शुभ मुहुर्त में श्वेत गुंजा की जड़ लाकर दूध से धोकर, सफेद चन्दन पुष्प से पूजा करके सफेद धागे में पिरोकर। “ऐं क्षं यं दं” मंत्र के ग्यारह हजार जाप करके स्त्री या पुरूष धारण करे तो संतान सुख की प्राप्ती होती है।

6• वशीकरण -

(क) आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं.  यह प्रयोग ग्रहण काल,  होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

 (ख)  गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

( गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

7• विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है।

8• विष-निवारण :

गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये। यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें।
इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

9•  दिव्य दृष्टि :-

(क) अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

 भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं।

(ख) गुप्त धन दर्शन :

अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

10• शत्रु में भय उत्पन्न :

गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

11• शत्रु दमन प्रयोग :

यदि लड़ाई झगड़े की नौबत हो तो काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा।

12•  रोग - बाधा

(क) कुष्ठ निवारण प्रयोग :

गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

(ख)अंधापन समाप्त :

गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं।नेत्रों की सफाई होती है आँखों का जाल कटता है।

देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

(ग) वाजीकरण:

श्वेत गुंजा की जड को गाय के शुद्ध घृत में पीसकर लेप तैयार करें। यह लेप शिश्न पर मलने से कामशक्ति की वृद्धि के साथ स्तंभन शक्ति में भी वृद्धि होती है।

13: नौकरी में बाधा

राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।



 **दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:

1• काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।

2• दिवाली के दिन अपने गल्‍ले के नीचे काली गुंजा जंगली बेल के दाने डालने से व्‍यवसाय में हो रही हानि रूक जाती है।

3• दिवाली की रात घर के मुख्‍य दरवाज़े पर सरसों के तेल का दीपक जला कर उसमें काली गुंजा के 2-4 दाने डाल दें। ऐसा करने पर घर सुरक्षित और समृद्ध रहता है।

4• होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।


5• घर से अलक्ष्मी दूर करने का लघु प्रयोग-

ध्यानमंत्र :

ॐ तप्त-स्वर्णनिभांशशांक-मुकुटा रत्नप्रभा-भासुरीं ।

नानावस्त्र-विभूषितां त्रिनयनां गौरी-रमाभ्यं युताम् ।

दर्वी-हाटक-भाजनं च दधतीं रम्योच्चपीनस्तनीम् ।

नित्यं तां शिवमाकलय्य मुदितां ध्याये अन्नपूर्णश्वरीम् ॥

मन्त्र :

ॐ ह्रीम् श्रीम् क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि मामाभिमतमन्नं देहि-देहि अन्नपूर्णों स्वाहा ।

विधि :

जब रविवार या गुरुवार को पुष्प नक्षत्र हो या नवरात्र में अष्टमी के दिन या दीपावली की रात्रि या अन्य किसी शुभ दिन से इस मंत्र की एक माला रुद्राक्ष माला से नित्य जाप करें । जाप से पूर्व भगवान श्रीगणेश जी का ध्यान करें तथा भगवान शिव का ध्यान कर नीचे दिये ध्यान मंत्र से माता अन्नपूर्णा का ध्यान करें ।

 इस मंत्र का जाप दुकान में गल्ले में सात काली गुंजा के दाने रखकर शुद्ध आसन, (कम्बल आसन, या साफ जाजीम आदि ) पर बैठकर किया जाए तो व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ महसूस होने गेगा ।


6• कष्टों से छुटकारे हेतु

यदि संपूर्ण दवाओं एवं डाक्टर के इलाज के बावजूद भी यदि घुटनों और पैरों का दर्द दूर नहीं हो रहा हो तो रवि पुष्य नक्षत्र, शनिवार या शनि आमवस्या के दिन यह उपाय करें। प्रात:काल नित्यक्रम से निवृत हो स्नानोपरांत लोहे की कटोरी में श्रद्धानुसार सरसों का तेल भरें। 7 चुटकी काले तिल, 7 लोहे की कील और  7 लाल और 7 काली गुंजा उसमें डाल दें। तेल में अपना मुंह देखने के बाद अपने ऊपर से 7 बार उल्टा उसारकर पीपल के पेड़ के नीचे इस तेल का दीपक जला दें 21 परिक्रमा करें और वहीं बैठकर 108 बार

 ऊँ शं विधिरुपाय नम:।।

 इस मंत्र का जाप करें। ऐसा 11 शनिवार करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

         
पीली गुंजा:
       
1• पीले रंग की गुंजा के बीज ,हल्दी की गांठे, सात कौडियों की पूजा अर्चना करके श्री लक्ष्मीनारायण  भगवान के मंत्रों से अभिमंत्रित करके पूजा स्थान में रखने से दाम्पत्य सुख एवं परिवार,मे एकता तथा आर्थिक व्यावसायिक सिद्धि मिलती है

2• इसकी माला या ब्रेसलेट धारण करने से व्यक्ति का चित्त शांत रहता है, तनाव से मुक्ति मिलती है।

3• पीत गुंजा की माला गुरु गृह को अनुकूल करती है।

4• अनिद्रा से पीड़ित लोगों को इसकी माला धारण करने से लाभ मिलता है।

5• बड़ी उम्र के जो लोग स्वप्न में डरते हैं या जिन्हें अक्सर ये लगता है की कोई उनका गला दबा रहा है उन्हें इसकी माला या ब्रेसलेट पहनना चाहिए।

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।।जय श्री राम।।
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Wednesday, 28 October 2015

अति दुर्लभ बेर का बाँदा Rarest Ber ka banda (first ever image on internet)

अति दुर्लभ बेर का बाँदा (first ever image on internet)

मित्रों,
काफी सारे लोग अक्सर बान्दे के बारे में प्रश्न करते हैं व मांगते हैं।
अतः आज इन्टरनेट पर पहली बार अतिदुर्लभ बेर के बान्दे का चित्र डाल रहा हूँ जो सौभाग्यवश इस नवरात्रि में पुनः प्राप्त हुआ।

बाँदा अपने आप में पूर्ण वनस्पति है और इसमें फल फूल भी लगते हैं।

चित्र में बान्दे का मूल और तना तथा फल के चित्र हैं।

लाभ और प्रयोग विधि:

बाँदा सौभाग्य से ही मिल सकता है।यदि कहीं दिख जाये, तो स्वाती नक्षत्र में विधिवत निमंत्रण देकर घर लाना चाहिए। घर आकर देव-प्रतिमा-स्थापन की संक्षिप्त विधि से स्थापन करके पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें।

इसके बाद ग्यारह माला शिव पंचाक्षर एवं ग्यारह माला देवी-नवार्ण मंत्रों का जप,हवन,तर्पण,मार्जन सम्पन्न करके कम से कम एक ब्राह्मण और एक दरिद्रनारायण को भोजन दक्षिणा सहित प्रदान करें।इस प्रकार आपका कार्य पूरा हो गया।

अब, जब भी आवश्यकता हो,उस पूजित काष्ठ में से थोड़ा अंश काट कर लाल या पीले कपड़े या तांबे के ताबीज में भरकर प्रयोग कर सकते हैं।

कल्याण भावना से (व्यापार नहीं)किसी को दे भी सकते हैं।

इस बदरी-बाँदा का एक मात्र कार्य है- मनोनुकूलता प्रदान करना यानि किसी से कुछ सहयोग लेना हो,कोई कार्य करवाना हो तो विधिवत धारण करके उस व्यक्ति के पास जाकर अपने इष्ट मंत्रों का मानसिक जप करते हुए प्रस्ताव रखना चाहिए।

अन्य ग्रंथ मतानुसार:-

अनेन ग्राह्येत स्वाति-नक्षत्रे बदरीभवम।
वन्दाकम तत्करे धृत्वा यदवस्तु प्राप्यते नरः।
तत्क्षणात प्राप्यते सर्व, म्न्त्रवाम्स्तु कथ्यते।

स्वाति नक्षत्र में निम्न मन्त्र से अभिमंत्रित करने पर अभीष्ट वस्तु देने वाला होता है।

मन्त्र:-
ॐ अन्तरिक्षाय स्वाहा।

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Wednesday, 21 October 2015

Money tree Shami स्वर्ण वृक्ष शमी


स्वर्ण वृक्ष शमी

सभी मित्रों को विजयदशमी की शुभकामनायें

मित्रों
आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं, एक ओर जहां रावण दहन होगा वहीं दूसरी ओर माँ अपराजिता का पूजन विजय प्राप्ति और शक्ति प्राप्ति की कामना से होगा।
दशहरा वर्ष के 4 अबूझ मुहूर्तों में से भी एक है और आज विभिन्न  तंत्रोक्त वस्तुओं , यंत्रों की सिद्धि और निर्माण के लिए भी उत्तम मुहूर्त है।

शमी में अग्नि का वास होने से वैदिक काल से ही यज्ञ के लिए अरणी मंथन क्रिया द्वारा इसकी मोटी टहनियों को रगड़कर अग्नि प्रज्वलित की जाती रही है.आज भी पारंपरिक वैदिक पंडित यज्ञ में अग्नि आमंत्रण अरणी मंथन द्वारा ही करते हैं.स्वर्ण अग्नि का वीर्य है और अग्नि का वास इस वृक्ष में होने से यह स्वर्ण उगलता है,ऐसा विश्वास किया जाता है.

रघुवंश में भी इस बारे में रोचक कथा का वर्णन मिलता है.प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा की पूर्णता पर शिष्य द्वारा गुरु दक्षिणा भेंट करना अति आवश्यक था.गुरु आरुणि के आश्रम में एक बार निर्धन परिवार से कौस्तेय नामक शिष्य आया.शिक्षा पूर्ण होने पर उसने गुरुदेव से दक्षिणा के लिए आग्रह किया.शिष्य की स्थिति को जानते हुए गुरु ने सहर्ष गुरुकुल छोड़ने की आज्ञा प्रदान की,लेकिन कौस्तेय अड़ा रहा कि उससे गुरु दक्षिणा ली जाए.

गुरु आरुणि ने आवेश में उससे दास लाख स्वर्ण मुद्राएं गुरु दक्षिणा के रूप में मांग लीं.इतनी अपुल राशि का अर्जन तो उसके लिए असंभव था,अतः उसने राजा रघु के पास जाने का निश्चय किया.राजा रघु प्रत्येक बारहवें वर्ष अपना समस्त राज्य-कोष,स्व एवं पत्नी के वस्त्राभूषण भी प्रजा को दान कर देते थे और सादा जीवन बिताते थे.सरल जीवन एवं उनके तप के प्रभाव से राज्यकोष पुनः स्वर्णपूरित हो जाता था.उस समय राजा रघु अपना सर्वस्व दान कर सादा जीवन व्यतीत कर रहे थे.

कौस्तेय राजा रघु के दरबार में पहुंचा लेकिन वहां की स्थिति जानकार अभिप्राय बताने में संकोच का अनुभव हो रहा था.राजा रघु द्वारा बार-बार पूछने पर कौस्तेय ने अपने आने का उद्देश्य बताया.राजा रघु ने दक्षिणा के लिए पूर्ण आश्वासित किया और धनपति कुबेर पर आक्रमण करने का निश्चय किया.यात्रा में रात्रि में एक वन में रुके.यह शमी का वृक्ष था.इसी अंतराल कुबेर को ज्ञात हो गया कि राजा रघु एक शिष्य की गुरु दक्षिणा के लिए आक्रमण हेतु राह में है.उसी रात्रि शमी वृक्षों के सारे पत्ते स्वर्ण मुद्रा में परिवर्तित हो गए और सारा वन स्वर्ण आभा से जगमगा उठा.प्रातः राजा रघु को इसकी जानकारी मिली.आक्रमण का विचार निरस्त कर उन्होंने कौस्तेय को गुरु दक्षिणा के लिए अनुरोध किया.कौस्तेय ने गिनकर दास लाख स्वर्ण मुद्रा ली और गुरु दक्षिणा अर्पित की.अपुल धन राशि  से राजा रघु का राज्य कोष पुनः स्वर्ण पूरित हो गया.

विजयादशमी के आस-पास घटी इस घटना के कारण आज भी अनेक राज-परिवारों में इस वृक्ष की पूजा विजयादशमी पर की जाती है.

शमी का महत्व:

1)बंगाल में दुर्गापूजा पर शमी वृक्ष की पत्तियां स्वर्ण प्रतीक रूप में परस्पर सद्भावना के लिए वितरित की जाती हैं.

2)इन्हें पूजा घर,तिजोरी में शुभ प्रतीक के रूप में रखा जाता है.

3)भगवान शिव,देवी दुर्गा,लक्ष्मी पूजन आदि में इस वृक्ष के फूल एवं ऋद्धि-सिद्धिदाता गणेश को पत्तियां अर्पित की जाती हैं.

4)इस वृक्ष की मोटी टहनियां अरणी मंथन द्वारा अग्नि उत्पन्न के लिए प्रधान यंत्र के अलावा पतली-सूखी टहनियां भी यज्ञ समिधा का भाग होती हैं.

5)भगवान राम ने अपने वनवास के समय जिस झोपड़ी का निर्माण किया था उसमें शमी वृक्ष की लकड़ियों का ही उपयोग किया गया था.

6)शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को स्वर्ण फूल चढ़ाने के बराबर सिर्फ आक का एक फूल चढ़ाने का चढ़ाने से फल मिलता है , हजार आक  के फूलो की अपेक्षा एक कनेर का फूल , हजार कनेर के फूल की अपेक्षा एक बिल्वपत्र , हजार बिल्वपत्र के बराबर एक द्रोण का फूल फलदाई है हजार द्रोण उनके बराबर फल एक चिचड़ा देता है हजार चिचड़ा  के बराबर फल एक कुश का पुष्प फल देता है हजार खुश फूलो के बराबर एक शमी का पत्ता फल देता है हजार शमी के पत्तो के बराबर एक नीलकमल और हज़ार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा फल देता है और 1000 दूर से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ पर फल और पूर्ण देने वाला होता है ।

7)विजयदशमी के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है मानता है कि भगवान राम का भी प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पूर्व होने समय की पूजा की थी और विजय होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था ।

8) महाभारत काल में भी मिलता है अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास में पांडवों ने अपने सारे अस्त्र शस्त्र इसी के ऊपर छिपाये थे जिस में अर्जुन का गांडीव धनुष भी था । कुरुक्षेत्र में कौरवों से युद्ध के लिए जाने से पहले पांडवों ने भी शमी की पूजा की थी और उसे शक्ति और विजय प्राप्त की कामना की थी कभी समय तभी से यह माना जाने लगा है कि जो भी सुरक्षित की पूजा करता है उसे शक्ति और विजय की प्राप्ति होती है।

9) शमी का पूजन व् सेवा शनि के द्वारा दिए जा रहे कष्टों को कम करता है और शनि को प्रसन्न करता है।

10) घर के बाहर ईशान कोण में लगाने और नित्य सेवा से घर में धन की कभी कमी नहीं होती और ऊपरी बाधाओं और दुर्घटनाओं से रक्षा होती है।

11) शमी की समिधा से हवन करने से एक ओर जहाँ शनि की शांति होती है वहीँ दूसरी ओर ऊपरी बाधा अभिचार नाश के लिए भी शमी समिधा का प्रयोग तीव्रतम असर करता है।

12) कुछ ज्योतिषाचार्य शनि शांति के लिए शमी की जड़ धारण करने की सलाह देते हैं हालाँकि ये शास्त्र सम्मत नहीं है।
नीलम के स्थान पर बिछू घास का ही प्रयोग करना उचित है।

व्यक्तिगत अनुभव से भी यही ज्ञात होता है की अभिमन्त्रित शमी मूल रखने से धन प्राप्ति के अवसर बढ़ते हैं किन्तु शनि के कुप्रभाव पर अधिक असर नहीं दिखा।
हाँ वृक्ष का नियमित पूजन अवश्य अतुलित फलदायी और शमी के कुप्रभाव को खत्म कर शनिदेव को प्रसन्न करता है।

कैसे करें पूजन:

प्रातः काल शमी वृक्ष के नीचे जाएँ और एक लोटा जल अर्पित करें। शाम के समय वृक्ष के पास जाकर नमन करें, धूप दीप करें, सफ़ेद कच्चा सूत या कच्चे सूत से बने कलावा लेकर सात परिक्रमा कर बांधे। प्रसाद स्वरुप बताशे और भुने चने अर्पित करें।
पूजन के पश्चात शमी की कुछ पत्तियां तोड़ कर घर ले आएं और सर्व प्रथम घर के मन्दिर में रखें। वहां से कुछ पत्तियां लेकर तिजोरी या गल्ले में रखें , और कुछ पत्तियां (5-7 पत्तियां) घर के प्रत्येक सदस्य को दें जिसे वे अपने पर्स में रखें।

नियमित पूजन में शमी पर प्रातः जल और शाम को धूप दीप अर्पित करें।

निम्न मन्त्र के द्वारा शमी का पूजन करें:-

शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी ।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी ॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया ।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।

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Thursday, 15 October 2015

Navratri special - Get answers in your dreams नवरात्रि विशेष- स्वप्न में उत्तर पाने हेतु सरल प्रयोग


नवरात्री विशेष) स्वप्न में उत्तर पाने हेतु एक सरल प्रयोग

मित्रों
जीवन में कई बार ऐसी समस्याएं आ जाती हैं कि जिनका समाधान नहीं मिलता और व्यक्ति चिंता के गर्त में फंसता जाता है। ज्योतिष पण्डित तांत्रिक सब उपाय कर लेता है किन्तु समाधान नहीं होता। समस्याएं और प्रश्न सुरसा के समान मुंह फैलाते जाते हैं।

आज आपको एक बेहद सरल प्रयोग दे रहा हूँ जिसके माध्यम से आप अपनी समस्या का समाधान प्राप्त कर सकते हैं। प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर सकते हैं।
कुछ भाग्यशाली लोगों को  इस प्रयोग के माध्यम से स्वप्न में मां भगवती के दर्शन भी हुए हैं।
नवरात्रि में आप जैसे अपना नियमित पूजा-पाठ करते है वैसे ही करें साथ में नवरात्रि की पंचमी तिथि से शुरु कर के चतुर्दशी तिथि तक मां के चरणों में जंगली लाल गुलाब के 7 फूल अर्पित करें । श्री दुर्गा सप्तशती मे दिए हुए सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का सात बार पाठ करें और धूप दीप कर पूजन व आरती  करें ।
संध्या के समय इन फूलो को उठाकर किसी स्वच्छ स्थान पर रख दे ,रात्रि में सोने से पहले   हाथ मुंह और पैर धो कर कुल्ला करके इन फूलो को उठा कर अपने बिस्तर पर रखे यह आपके सर के दाई और होने चाहिए ।

सोते समय मां से प्रार्थना करें की

हे आदि शक्ति महा शक्ति सर्व शक्ति  अपने इष्ट देवी अथवा कुलदेवी को याद करें मुझे स्वप्न में दर्शन दो मेरी समस्याओं का समाधान करो  मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दो इसके बाद मन ही मन अपनी समस्या को दोहराए

फिर  सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का  तब तक निरंतर पाठ करते रहे जब तक नींद ना आ जाए।

आपको शीघ्र ही अपने प्रश्न का उत्तर अथवा आपकी समस्या का समाधान प्राप्त हो जाएगा।

इस प्रयोग के अनुभव :
कई भाग्यशाली लोग को मां ने स्वप्न मे स्वयम प्रकट होकर उत्तर दिया है जबकि कई लोग को  इसी देवस्थान  अथवा मंदिर मे मां के दर्शन हुए है ।
बहुत से लोग को मां से प्रत्यक्ष रुप से दर्शन नहीं होते  बल्कि में किसी बालिका या सुहागिन स्त्री के रुप में दर्शन देती है अतः यदि आपको भी स्वप्न में कोई बालिका कुमारी या सुहागन स्त्री दिखे  तो उसे सामान्य ना समझे और देवी का ही रुप समझें।
कुछ लोग को ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे वह कोई फिल्म देख रहे हो और उस फिल्म के माध्यम से ही उनकी समस्या का समाधान प्राप्त हो गया कुछ लोग ऐसे भी रहे जिन्हें कुछ भी नहीं दिखा पर ऐसा अनुभव हुआ जैसे कोई उन के कान में आकर  कुछ कह गया या उनकी समस्या का समाधान बता गया ।
कुछ लोग को इस प्रयोग के माध्यम से स्वप्न में सट्टे का नंबर भी प्राप्त हुआ है।

पंचमी से चतुर्दशी पर्यन्त सभी फूल एकत्रित करते रहें और पूर्णिमा पर किसी नदी में विसर्जित कर दें।

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Thursday, 1 October 2015

Some Astrological reasons for Divorce / तलाक के ज्योतिषीय कारण

तलाक के ज्योतिषीय कारण:

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जातक की कुंडली के दूसरे, पंचवें, सातवें, आठवें व बारहवें भाव तथा इनके स्वामी द्वितेश पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश का दांपत्य जीवन में सुख दुख प्रेम व कलह व विघटन हेतु निरीक्षण किया जाता है। इसके अलावा स्त्री हेतु नैसर्गिक कारक ग्रह बृहस्पति व पुरुष हेतु नैसर्गिक कारक ग्रह शुक्र का निरीक्षण किया जाता है। विवाह की दृष्टि से जातक की जन्मकुंडली के वर्गों का निरीक्षण भी किया जाता है इनमे सबसे प्रमुख रूप से नवां वर्ग नवमांश, सतवां वर्ग सप्तमांश, चालीसवां वर्ग ख्वेदामांश का निरीक्षण किया जाता है। विवाह विघटन के निरीक्षण हेतु विशेष रूप से सातवें आठवें बरहवें भाव में उपस्थित विशिष्ट क्रूर व पापी ग्रह जैसे मंगल व सूर्य तथा शनि व राहू की स्थिति को भी देखा जाता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विवाह भंग अर्थात तलाक या विवाह विछेदन योग अर्थात सेपरेशन का परिणाम समुदाय अष्टकवर्ग में भावों द्वारा प्राप्त बिन्दु पर भी निर्भर करता है, इसके साथ-साथ भिन्नाय अष्टकवर्ग में द्वितेश पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश द्वारा प्राप्त अंक, पंचवें, सातवें, आठवें व बारहवें भावों का बल, द्वितेश पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश का इष्ट और कष्ट फल पर भी निर्भर करता है। परंतु सर्वाधिक रूप से इस बात पर निर्भर करता है के सप्तम भाव और सप्तम भाव का स्वामी किस पापी और क्रूर ग्रह से सर्वाधिक रूप से प्रताडि़त है। सप्तम भाव में सूर्य, राहू शनि व मंगल की उपस्थिती या सप्तमेश का नीच या वेधा स्थान में बैठकर पापी व क्रूर ग्रह से पीड़ित होना तलाक या सेपरेशन का कारण बनता है।



तलाक के ज्योतिषीय कारण:

सातवें भाव में बैठे द्वादशेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है।

बारहवें भाव में बैठें सप्तमेश से राहु की युति हो तो तलाक होता है।

पंचम भाव में बैठे द्वादशेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है।

पंचम भाव में बैठे सप्तमेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है।

सातवें भाव का स्वामी और बाहरवें भाव का स्वामी अगर दसवें भाव में युति करता हो तो में तलाक होता है।

सातवें घर में पापी ग्रह हों व चंद्रमा व शुक्र पापी ग्रह से पीड़ित हो पति-पत्नी के तलाक लेने के योग बनते हैं।

सप्तमेश व द्वादशेश छठे आठवें या बाहरवें भाव में हो और सातवें घर में पापी ग्रह हों तो तलाक के योग बनते है।
सातवें घर में बैठे सूर्य पर शनि के साथ शत्रु की दृष्टि होने पर तलाक होता है।

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Saturday, 26 September 2015

Attraction by Rudraksh/ रुद्राक्ष से सर्वजन मोहन

रुद्राक्ष से करें सर्वजन मोहन

यदि आप एसे किसी भी काम से जुडे हैँ  जिसमे आपको बहुत सारे लोगोँ से मिलना होता है और अपनी बातोँ से प्रभावित करना होता है  जेसे सेल्स ,मार्केटिंग ,डायरेक्ट मार्केटिंग ,चेन मार्केटिंग ,कॉल सेंटर ,पब्लिक रिलेशंस या आप व्यापारी है और आपको ऐसा लगता है कि आपको समुचित लाभ नहीँ मिल पा रहा है या आप अपनी बातोँ से अपने ग्राहक को संतुष्ट नहीँ कर पा रहे हैँ तो निम्न उपाय करेँ :-

किसी भी सोमवार को असली चार मुखी, पांच मुखी और छह मुखी रुद्राक्ष के तीन तीन दाने यानि कुल 9 रुद्राक्ष के दाने लेकर उन्हें एक कच्चे सूत के लाल कलावे या धागे मेँ मुंह से पूछ की ओर पिरो ले और उनके बीच मेँ सवा गांठ लगाएँ ।
धागे की लंबाई इतनी रखेँ कि रुद्राक्ष की ये कण्ठी आपके हृदय के समीप रहे। इस रुद्राक्ष कण्ठी को लेकर शिव मंदिर जाएँ और उसे शिवलिंग पर रखकर जल से अभिषेक करेँ
अभिषेक करते समय निरंतर
ॐ नमः शिवाय

का जाप करेँ और
संभव हो तो भगवान शिव की प्रिय वस्तु जैसे बेल ,धतूरा, भांग, निर्गुण्डी आदि अर्पित करेँ । भस्म से भगवान को तिलक/ त्रिपुण्ड दें और फिर कण्ठी के प्रत्येक रुद्राक्ष पर भी इसी भस्म से बिंदी लगाएं और

भोलेनाथ से प्रार्थना करेँ कि आपकी वाणी मेँ ऐसा ओज और आकर्षण उत्पन्न हो जिससे जो भी आपके बात सुने आपकी बातों से मोहित होने लगे, फिर वहीँ बैठ कर एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जप करें और उस कण्ठी को धारण कर लें।

शीघ्र ही आपको अपने कार्य में सुधार दिखने लगेगा।
ये आजमाया हुआ प्रयोग है और कई मित्रों को इससे बेहतरीन लाभ प्राप्त हुआ है।

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Thursday, 24 September 2015

Totke for good health /स्वास्थ्य के लिये टोटके

स्वास्थ्य के लिये टोटके

1) अगर परिवार में कोई परिवार में कोई व्यक्ति बीमार है तथा लगातार औषधि सेवन के पश्चात् भी
स्वास्थ्य लाभ नहीं हो रहा है, तो किसी भी रविवार से आरम्भ करके लगातार 3 दिन तक गेहूं के आटे का
पेड़ा तथा एक लोटा पानी व्यक्ति के सिर के ऊपर से उबार कर जल को पौधे में डाल दें तथा पेड़ा गाय को
खिला दें। अवश्य ही इन 3 दिनों के अन्दर व्यक्ति स्वस्थ महसूस करने लगेगा। अगर टोटके की अवधि में
रोगी ठीक हो जाता है, तो भी प्रयोग को पूरा करना है, बीच में रोकना नहीं चाहिए।

2) अमावस्या को प्रात: मेंहदी का दीपक पानी मिला कर बनाएं। तेल का चौमुंहा दीपक बना कर 7 उड़द के
दाने, कुछ सिन्दूर, 2 बूंद दही डाल कर 1 नींबू की दो फांकें शिवजी या भैरों जी के चित्र का पूजन कर, जला
दें। महामृत्युजंय मंत्र की एक माला या बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ कर रोग-शोक दूर करने की भगवान से
प्रार्थना कर, घर के दक्षिण की ओर दूर सूखे कुएं में नींबू सहित डाल दें। पीछे मुड़कर नहीं देखें। उस दिन
एक ब्राह्मण -ब्राह्मणी को भोजन करा कर वस्त्रादि का दान भी कर दें। कुछ दिन तक पक्षियों, पशुओं और
रोगियों की सेवा तथा दान-पुण्य भी करते रहें। इससे घर की बीमारी, भूत बाधा, मानसिक अशांति
निश्चय ही दूर होती है।

3) अगर बीमार व्यक्ति ज्यादा गम्भीर हो, तो जौ का 125 पाव (सवा पाव) आटा लें। उसमें साबुत काले
तिल मिला कर रोटी बनाएं। अच्छी तरह सेंके, जिससे वे कच्ची न रहें। फिर उस पर थोड़ा सा तिल्ली का
तेल और गुड़ डाल कर पेड़ा बनाएं और एक तरफ लगा दें। फिर उस रोटी को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7
बार वार कर किसी भैंसे को खिला दें। पीछे मुड़ कर न देखें और न कोई आवाज लगाए। भैंसा कहाँ मिलेगा,
इसका पता पहले ही मालूम कर के रखें। भैंस को रोटी नहीं खिलानी है, केवल भैंसे को ही श्रेष्ठ रहती है।
शनि और मंगलवार को ही यह कार्य करें।

4) पीपल के वृक्ष को प्रात: 12 बजे के पहले, जल में थोड़ा दूध मिला कर सींचें और शाम को तेल का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। ऐसा किसी भी वार से शुरू करके 7 दिन तक करें। बीमार व्यक्ति को आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा।

5) घर से बीमारी जाने का नाम न ले रही हो, किसी का रोग शांत नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र ले
कर उसे हांडी में पिरो कर रोगी के पलंग के पाये पर बांधने से आश्चर्यजनक परिणाम मिलता है। उस दिन
 से रोग समाप्त होना शुरू हो जाता है।

6) यदि आपका बच्चा बहुत जल्दी-जल्दी बीमार पड़ रहा हो और आप को लग रहा कि दवा काम नहीं कर
रही है, डाक्टर बीमारी खोज नहीं पा रहे है। तो यह उपाय शुक्ल पक्ष की अष्टमी को करना चाहिये। आठ
गोतमी चक्र ले और अपने पूजा स्थान में मां दुर्गा के श्रीविग्रह के सामने लाल रेशमी वस्त्र पर स्थान दें। मां
भगवती का ध्यान करते हुये कुंकुम से गोमती चक्र पर तिलक करें। धूपबत्ती और दीपक प्रावलित करें।
धूपबत्ती की भभूत से भी गोमती चक्र को तिलक करें। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे की 11 माला जाप

करें। जाप के उपरांत लाल कपड़े में 3 गोमती चक्र बांधकर ताबीज का रूप देकर धूप, दीप दिखाकर बच्चे के
गले में डाल दें। शेष पांच गोमती चक्र पीले वस्त्र में बांधकर बच्चे के ऊपर से 11 बार उसार कर के किसी
विराने स्थान में गड्डा खोदकर दबा दें। आपका बच्चा हमेशा सुखी रहेगा।

7) घर मे जहा पर भी पानी लीक हो रहा हो उसे तुरंत ठीक करवा लेना चाहिए. घर मे पानी का टपकता रहना योग्य नहीं कहा जाता तथा ऐसे घर के सभ्यो मे मानसिक रोग की सम्भावना बढ़ जाती है.


 8) सूर्य को सूर्योदय के समय अर्ध्य देना अत्यधिक उत्तम होता है. उस समय “ औम घृणी सूर्य आदित्याय सर्व दोष निवारणाय नमः” का ११ बार उच्चारण करने से सभी दोषों से मुक्ति मिलती है

9) संध्या काल मे साधक अगर निर्जन वातावरण मे ५ अगरबत्ती पंच तत्वों को याद कर के लगा दे तथा पूर्वजो को मदद के लिए प्रार्थना करे तो सर्व लक्ष्मी तथा स्वास्थ्य सबंधित दोषों की निवृति होती है

10) सूर्यास्त के समय अपने जल संग्रह स्थान के पास एक दीप जलने पर आकाश तथा जल स्वास्थ्य सबंधित सर्व दोषों की निवृति होती है

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Sarv karya Sadhak Shabar mantra / सर्वकार्य साधक शाबरमंत्र

कई बार व्यक्ति की समृद्धि अचानक रुष्ट हो जाती है,सारे बने बनाये कार्य बिगड जाते है,जीवन की सारी खुशिया नाराज सी लगती हैं,जिस भी काम में हाथ डालो असफलता ही हाथ लगती है.घर का कोई सदस्य जब चाहे तब घर से भाग जाता है,या हमेशा गुमसुम सा पागलों सा व्यवहार करता हो,तब ये प्रयोग जीवन की विभिन्न समस्याओं का न सिर्फ समाधान करता है अपितु पूरी तरह उन्हें नष्ट ही कर देता और आने वाले पूरे जीवन में भी आपको सपरिवार तंत्र बाधा और स्थान दोष ,दिशा दोष से मुक्त कर अभय ही दे देता हैं.

जीवन मे कितनी विकट स्थिति हो ओर कितनी ही परेशानी हो

अगर आप इस मन्त्र का हर रोज केवल 10 मिंट जाप करते हो तो कोई भी संकट नहीं रहेगा.
घर मे क्लेश हो यो उपरी बढ़ा हो आप खुद को असुरक्षित मह्सुश करते हो। या ओर कोई परेशानी हो तो भी घर मे सुख समृधि के लिये इस मन्त्र का जाप करे .. .

शाबरमंत्रशक्ति का एक बहुत ही शक्तिशाली मन्त्र :

 मन्त्र :  

                                                    ओम नमो आदेश गुरु का। 
              वज्र वज्रि वज्र किवाड़ वज्र से बांधा दशो द्वार, जो घात घाले उलट वेद वाही को खात ,
                       पहली चोकी गणपति की, दूजी चोकी हनुमंत की ,तीजी चोकी भैरव की ,
                                  चौथी चोकी रोम रोम रक्षा करने को नृसिंह जी आयें ,
                                        शब्द साचा पिण्ड काचा फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।।

. इस मन्त्र की महिमा अपरंपार है ..... चाहो तो आजमा कर देख लो ....... पूरे शाबर मन्त्र साहित्य मे शायद ही कोई इस मन्त्र से शक्ति शाली मन्त्र हो इस मन्त्र के 100 से अधिक प्रयोग हैं।

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Shri Kaal Bhairav / श्री काल-भैरव

                                                                   ।।श्री काल-भैरव।।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है।

शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के दो स्वरूप बताए गए हैं। एक स्वरूप में महादेव अपने भक्तों को अभय देने वाले विश्वेश्वरस्वरूप हैं वहीं दूसरे स्वरूप में भगवान शिव दुष्टों को दंड देने वाले कालभैरव स्वरूप में विद्यमान हैं। शिवजी का विश्वेश्वरस्वरूप अत्यंत ही सौम्य और शांत हैं यह भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।वहीं भैरव स्वरूप रौद्र रूप वाले हैं, इनका रूप भयानक और विकराल होता है। इनकी पूजा करने वाले भक्तों को किसी भी प्रकार डर कभी परेशान नहीं करता। कलयुग में काल के भय से बचने के लिए कालभैरव की आराधना सबसे अच्छा उपाय है। कालभैरव को शिवजी का ही रूप माना गया है। कालभैरव की पूजा करने वाले व्यक्ति को किसी भी प्रकार का डर नहीं सताता है।

भैरव शब्द का अर्थ ही होता है- भीषण, भयानक, डरावना।

भैरव को शिव के द्वारा उत्पन्न हुआ या शिवपुत्र माना जाता है। भगवान शिव के आठ विभिन्न रूपों में से भैरव एक है। वह भगवान शिव का प्रमुख योद्धा है। भैरव के आठ स्वरूप पाए जाते हैं। जिनमे प्रमुखत: काला और गोरा भैरव अतिप्रसिद्ध हैं।

रुद्रमाला से सुशोभित, जिनकी आंखों में से आग की लपटें निकलती हैं, जिनके हाथ में कपाल है, जो अति उग्र हैं, ऐसे कालभैरव को मैं वंदन करता हूं।- भगवान कालभैरव की इस वंदनात्मक प्रार्थना से ही उनके भयंकर एवं उग्ररूप का परिचय हमें मिलता है।

कालभैरव की उत्पत्ति की कथा शिवपुराण में इस तरह प्राप्त होती है-
एक बार मेरु पर्वत के सुदूर शिखर पर ब्रह्मा विराजमान थे, तब सब देव और ऋषिगण उत्तम तत्व के बारे में जानने के लिए उनके पास गए। तब ब्रह्मा ने कहा वे स्वयं ही उत्तम तत्व हैं यानि कि सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च हैं। किंतु भगवान विष्णु इस बात से सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा कि वे ही समस्त सृष्टि से सर्जक और परमपुरुष परमात्मा हैं। तभी उनके बीच एक महान ज्योति प्रकट हुई। उस ज्योति के मंडल में उन्होंने पुरुष का एक आकार देखा। तब तीन नेत्र वाले महान पुरुष शिवस्वरूप में दिखाई दिए। उनके हाथ में त्रिशूल था, सर्प और चंद्र के अलंकार धारण किए हुए थे। तब ब्रह्मा ने अहंकार से कहा कि आप पहले मेरे ही ललाट से रुद्ररूप में प्रकट हुए हैं। उनके इस अनावश्यक अहंकार को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उस क्रोध से भैरव नामक पुरुष को उत्पन्न किया। यह भैरव बड़े तेज से प्रज्जवलित हो उठा और साक्षात काल की भांति दिखने लगा।
इसलिए वह कालराज से प्रसिद्ध हुआ और भयंकर होने से भैरव कहलाने लगा। काल भी उनसे भयभीत होगा इसलिए वह कालभैरव कहलाने लगे। दुष्ट आत्माओं का नाश करने वाला यह आमर्दक भी कहा गया। काशी नगरी का अधिपति भी उन्हें बनाया गया। उनके इस भयंकर रूप को देखकर बह्मा और विष्णु शिव की आराधना करने लगे और गर्वरहित हो गए।

लौकिक और अलौकिक शक्तियों के द्वारा मानव जीवन में सफलता पायी जा सकती है, लेकिन शक्तियां जहां स्थिर रहती है, वहीं अलौकिक शक्तियां हर पल, हर क्षण मनुष्य के साथ-साथ रहती है। अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करने का श्रोत मात्र देवी देवताओं की साधना, उपासना शीघ्र फलदायी मानी गई है।

 कालभैरव भगवान शिव के पांचवें स्वरूप है तो विष्णु के अंश भी है। इनकी उपासना मात्र से ही सभी प्रकार के दैहिक, दैविक, मानसिक परेशानियों से शीघ्र मुक्ति मिलती है। कोई भी मानव इनकी पुजा, आराधना, उपासना से लाभ उठा सकता है। आज इस विषमता भरे युग में मानव को कदम-कदम पर बाधाओं, विपत्तियों और शत्रुओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मंत्र साधना ही इन सब समस्याओं पर विजय दिलाता है। शत्रुओं का सामना करने, सुख-शान्ति समृद्धि में यह साधना अति उत्तम है।

शिव पुराण में वर्णित है--

भैरव: पूर्ण रूपोहि शंकर परात्मन: भूगेस्तेवैन जानंति मोहिता शिव भामया:।

देवताओं ने श्री कालभैरव की उपासना करते हुए बताया है कि काल की तरह रौद्र होने के कारण यह कालराज है। मृत्यु भी इनसे भयभीत रहती है। यह कालभैरव है इसलिए दुष्टों और शत्रुओं का नाश करने में सक्षम है। तंत्र शास्त्र के प्रव‌र्त्तक आचार्यो ने प्रत्येक उपासना कर्म की सिद्धि के लिए किए जाने वाले जप पाठ आदि कर्र्मो के आरंभ में भगवान भैरवनाथ की आज्ञा प्राप्त करने का निर्देश किया है।

अतिक्रूर महाकाय, कल्पानत-दहनोपय,भैरवाय नमस्तुभ्यमेनुझां दातुमहसि।

इससे स्पष्ट है कि सभी पुजा पाठों की आरंभिक प्रक्रिया में भैरवनाथ का स्मरण, पूजन, मंत्रजाप आवश्यक होते है। श्री काल भैरव का नाम सुनते ही बहुत से लोग भयभीत हो जाते है और कहते है कि ये उग्र देवता है। अत: इनकी साधना वाम मार्ग से होती है इसलिए यह हमारे लिए उपयोगी नहीं है। लेकिन यह मात्र उनका भ्रम है। प्रत्येक देवता सात्विक, राजस और तामस स्वरूप वाले होते है, किंतु ये स्वरूप उनके द्वारा भक्त के कार्र्यो की सिद्धि के लिए ही धरण किये जाते है। श्री कालभैरव इतने कृपालु एवं भक्तवत्सल है कि सामान्य स्मरण एवं स्तुति से ही प्रसन्न होकर भक्त के संकटों का तत्काल निवारण कर देते है।

तंत्राचार्यों का मानना है कि वेदों में जिस परम पुरुष का चित्रण रुद्र में हुआ, वह तंत्र शास्त्र के ग्रंथों में उस स्वरूप का वर्णन 'भैरव' के नाम से किया गया, जिसके भय से सूर्य एवं अग्नि तपते हैं। इंद्र-वायु और मृत्यु देवता अपने-अपने कामों में तत्पर हैं, वे परम शक्तिमान 'भैरव' ही हैं। भगवान शंकर के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है।

तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती हैं।

वामकेश्वर तंत्र की योगिनीहदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं-

'विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात्‌ सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः।'

भ- से विश्व का भरण, र- से रमश, व- से वमन अर्थात सृष्टि को उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। तंत्रालोक की विवेक-टीका में भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है।
श्री तंत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं

'भ' अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है, भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिक सूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है। वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष, बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।

'र' अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं। उनके वस्त्र लाल हैं। सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग, खेट (मूसल), अंकुश, गदा, पाश, शूल, वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।
'व' अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक के सामान श्वेत हैं। वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है। विकसित कमल पुष्प उनका आसन है। वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल, वर एवं अभय धारण करती हैं।

स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है।

गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए, तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी 'काशी' में आकर दोष मुक्त हुए।

ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव। लेकिन इसी पुराण के गणपति- खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है।

तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं।

भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है।

भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।

जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगानालाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।

भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।

खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं।

 वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, ‍लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।
भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है।

शिव के अवतार श्री कालभैरव अपने भक्तों पर तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। साथ ही इनकी आराधना करने पर हमारे कई बुरे गुण स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। आदर्श और उच्च जीवन व्यतीत करने के लिए कालभैरव से भी शिक्षा ली जा सकती हैं।

जीवन प्रबंधन से जुड़े कई संदेश श्री भैरव देते हैं-

भैरव को भगवान शंकर का पूर्ण रूप माना गया है। भगवान शंकर के इस अवतार से हमें अवगुणों को त्यागना सीखना चाहिए। भैरव के बारे में प्रचलित है कि ये अति क्रोधी, तामसिक गुणों वाले तथा मदिरा के सेवन करने वाले हैं। इस अवतार का मूल उद्देश्य है कि मनुष्य अपने सारे अवगुण जैसे- मदिरापान, तामसिक भोजन, क्रोधी स्वभाव आदि भैरव को समर्पित कर पूर्णत: धर्ममय आचरण करें। भैरव अवतार हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि हर कार्य सोच-विचार कर करना ही ठीक रहता है। बिना विचारे कार्य करने से पद व प्रतिष्ठा धूमिल होती है।

श्रीभैरवनाथसाक्षात् रुद्र हैं। शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वेदों में जिस परमपुरुष का नाम रुद्र है, तंत्रशास्त्रमें उसी का भैरव के नाम से वर्णन हुआ है।

तन्त्रालोक की विवेकटीका में भैरव शब्द की यह व्युत्पत्ति दी गई है- बिभíत धारयतिपुष्णातिरचयतीतिभैरव: अर्थात् जो देव सृष्टि की रचना, पालन और संहार में समर्थ है, वह भैरव है। शिवपुराणमें भैरव को भगवान शंकर का पूर्णरूप बतलाया गया है। तत्वज्ञानी भगवान शंकर और भैरवनाथमें कोई अंतर नहीं मानते हैं। वे इन दोनों में अभेद दृष्टि रखते हैं।

 भैरव शब्द के तीन अक्षरों भ-र-वमें ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उत्पत्ति-पालन-संहार की शक्तियां सन्निहित हैं। नित्यषोडशिकार्णव की सेतुबन्ध नामक टीका में भी भैरव को सर्वशक्तिमान बताया गया है-भैरव: सर्वशक्तिभरित:।शैवोंमें कापालिकसम्प्रदाय के प्रधान देवता भैरव ही हैं। ये भैरव वस्तुत:रुद्र-स्वरूप सदाशिवही हैं। शिव-शक्ति एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की उपासना कभी फलीभूत नहीं होती। यतिदण्डैश्वर्य-विधान में शक्ति के साधक के लिए शिव-स्वरूप भैरवजीकी आराधना अनिवार्य बताई गई है।

रुद्रयामल में भी यही निर्देश है कि तन्त्रशास्त्रोक्तदस महाविद्याओंकी साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए उनके भैरव की भी अर्चना करें। उदाहरण के लिए कालिका महाविद्याके साधक को भगवती काली के साथ कालभैरवकी भी उपासना करनी होगी। इसी तरह प्रत्येक महाविद्या-शक्तिके साथ उनके शिव (भैरव) की आराधना का विधान है। दुर्गासप्तशतीके प्रत्येक अध्याय अथवा चरित्र में भैरव-नामावली का सम्पुट लगाकर पाठ करने से आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं, इससे असम्भव भी सम्भव हो जाता है। श्रीयंत्रके नौ आवरणों की पूजा में दीक्षाप्राप्तसाधक देवियों के साथ भैरव की भी अर्चना करते हैं।

अष्टसिद्धि के प्रदाता भैरवनाथके मुख्यत:आठ स्वरूप ही सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं पूजित हैं। इनमें भी कालभैरव तथा बटुकभैरव की उपासना सबसे ज्यादा प्रचलित है। काशी के कोतवाल कालभैरवकी कृपा के बिना बाबा विश्वनाथ का सामीप्य नहीं मिलता है। वाराणसी में निíवघ्न जप-तप, निवास, अनुष्ठान की सफलता के लिए कालभैरवका दर्शन-पूजन अवश्य करें। इनकी हाजिरी दिए बिना काशी की तीर्थयात्रा पूर्ण नहीं होती। इसी तरह उज्जयिनीके कालभैरवकी बडी महिमा है। महाकालेश्वर की नगरी अवंतिकापुरी(उज्जैन) में स्थित कालभैरवके प्रत्यक्ष मद्य-पान को देखकर सभी चकित हो उठते हैं।

धर्मग्रन्थों के अनुशीलन से यह तथ्य विदित होता है कि भगवान शंकर के कालभैरव-स्वरूपका आविर्भाव मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषकाल-व्यापिनीअष्टमी में हुआ था, अत:यह तिथि कालभैरवाष्टमी के नाम से विख्यात हो गई। इस दिन भैरव-मंदिरों में विशेष पूजन और श्रृंगार बडे धूमधाम से होता है। भैरवनाथके भक्त कालभैरवाष्टमी के व्रत को अत्यन्त श्रद्धा के साथ रखते हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से प्रारम्भ करके प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रदोष-व्यापिनी अष्टमी के दिन कालभैरवकी पूजा, दर्शन तथा व्रत करने से भीषण संकट दूर होते हैं और कार्य-सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। पंचांगों में इस अष्टमी को कालाष्टमी के नाम से प्रकाशित किया जाता है।

ज्योतिषशास्त्र की बहुचíचत पुस्तक लाल किताब के अनुसार शनि के प्रकोप का शमन भैरव की आराधना से होता है।  भैरवनाथके व्रत एवं दर्शन-पूजन से शनि की पीडा का निवारण होगा। कालभैरवकी अनुकम्पा की कामना रखने वाले उनके भक्त तथा शनि की साढेसाती, ढैय्या अथवा शनि की अशुभ दशा से पीडित व्यक्ति इस कालभैरवाष्टमीसे प्रारम्भ करके वर्षपर्यन्तप्रत्येक कालाष्टमीको व्रत रखकर भैरवनाथकी उपासना करें।

कालाष्टमीमें दिन भर उपवास रखकर सायं सूर्यास्त के उपरान्त प्रदोषकालमें भैरवनाथकी पूजा करके प्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है।

मन्त्रविद्याकी एक प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपि से महाकाल भैरव का यह मंत्र मिला है-

ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकालभैरवाय नम:।

इस मंत्र का 21हजार बार जप करने से बडी से बडी विपत्ति दूर हो जाती है।।

साधक भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ते) को नित्य कुछ खिलाने के बाद ही भोजन करे।

साम्बसदाशिवकी अष्टमूíतयोंमें रुद्र अग्नि तत्व के अधिष्ठाता हैं। जिस तरह अग्नि तत्त्‍‌व के सभी गुण रुद्र में समाहित हैं, उसी प्रकार भैरवनाथभी अग्नि के समान तेजस्वी हैं। भैरवजीकलियुग के जाग्रत देवता हैं। भक्ति-भाव से इनका स्मरण करने मात्र से समस्याएं दूर होती हैं।

इनका आश्रय ले लेने पर भक्त निर्भय हो जाता है। भैरवनाथअपने शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं

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।।जय श्री राम।।

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Shri Gauri Tantra Siddha Kunjika Stotra श्री गौरी तंत्रोक्त कुञ्जिका स्तोत्र

।। श्री गौरी तंत्रोक्त कुञ्जिका स्तोत्र ।।


ईश्वर उवाच

श्रुणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकामंत्रमुत्तमम्‌।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीपाठ फलं भवेत्‌॥1॥

न वर्म नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्‌।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासश्च न पूजनम् ॥2॥

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥ 3॥

स्वयोनिवत्प्रयत्नेन गोपनीयं हि पार्वति ।।3.1।।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥4॥

    || अथ मंत्रः ||

ॐ श्रूं श्रूं श्रूं शं फट् ऐं ह्रीं क्लीं ज्वलोज्वल प्रज्वल ह्रीं ह्रीं क्लीं स्रावय स्रावय शापं मोचय मोचय श्रां श्रीं श्रं जूं सः आदाय आदाय स्वाहा ॥ १ ।।

ॐ श्लों हुं ग्लों जूं सः ज्वलोज्वल मन्त्रान् प्रबलय प्रबलय हं सं लं क्षं स्वाहा ॥ २ ।।

ॐ अं कं चं टं तं पं सां बिन्दुर्-आविर्भव बिन्दुर्आविर्भव विमर्दय विमर्दय हं क्षं क्षीं स्त्रीं जीवय जीवय त्रोटय त्रोटय जम्भय जम्भय दीपय दीपय मोचय मोचय हुं फट् ज्रां वौषट् ऐं ह्रीं क्लीं रञ्जय रञ्जय संजय संजय गुञ्जय गुञ्जय बन्धय बन्धय भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे संकुच संकुच संचल संचल त्रोटय त्रोटय म्लीं स्वाहा ॥ ३ ।।

    ||   इति मंत्र ||

नमस्ते रुद्ररूपायै नमस्ते मधु-मर्दिनि ।
नमस्ते कैटभार्यै नमस्ते महिषमर्दिनि ॥ ४ ।।
नमस्ते शुंभहन्त्र्यै च निशुंभासुर-सूदिनि ।
नमस्ते जाग्रते देवि जपे सिद्धिं कुरूष्व मे ॥ ५ ।।
ऐंकारी सृष्टिरूपिण्यै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ६ ।।
चामुण्डा चण्ड्घाती च यैकारी वर-दायिनी ।
विच्चे नोऽभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥ ७ ।।
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागीश्वरी तथा ।
क्रां क्रीं क्रूं कुब्जिका देवि श्रां श्रीं श्रूं मे शुभं कुरु ॥ ८ ।।
हूं हूं हूंकाररूपिण्यै ज्रां ज्रीं ज्रूं भालनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥ ९ ।।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
म्लां म्लीं म्लूं मूलविस्तीर्णा कुब्जिकायै नमो नमः ॥ १० ।।
इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति।।११ ।।
कुंजिका रहितां देवी यस्तु  सप्तशतीं पठेत्‌।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।१२।।

।।  श्री गौरीतंत्रे ईश्वरपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ।।
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।।जय श्री राम।।
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Thursday, 20 August 2015

Hanuman Raksha mantra for safety हनुमान रक्षा शाबर मन्त्र

अजीब लगता है देखकर जब लोग कहते हैं इसे ग्रहण काल में सिद्ध करो 11 या 51माला जप से
जबकि वास्तव में यह स्वयं सिद्ध मन्त्र है और नित्य प्रति मात्र 7 बार पाठ करने से सब प्रकार की बाधाओ से शारीरिक और मानसिक रूप से रक्षा करता है।
विपत्ति के समय, संकट में पड़ने पर, वन शमशान या सुनसान मार्ग पर या रात्रि काल में, जागते या सोते समय डर लगने पर मात्र 7 बार पढ़ने से सब प्रकार से सुरक्षा होती है।
ये स्वयं सिद्ध मन्त्र है और गुरु शिष्य परम्परा से है इसलिए सिद्ध करने की जरूरत नहीं है सीधे प्रयोग में लाया जा सकता है


ॐ नमो गुरूजी को आदेश
गुरु जी को प्रणाम,
धरती माता धरती पिता
धरती धरे न धीर,
बाजे श्रृंगी बाजे तुरतुरी
आया गोरखनाथ वीर,
मीन का पूत मूंज का छ्ड़ा
लोहे का कड़ा,
हमारी पीठ पीछे यति हनुमन्त खड़ा,
शब्द साँचा पिंड कांचा फुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा।।

बच्चों को नजर आदि लगने पर डरने चौंकने इस रोने पर भी भस्म अभिमन्त्रित कर लगाने तुरन्त से लाभ मिलता है।

।।जय श्री राम।।
अभिषेक बी पाण्डेय
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Tuesday, 2 June 2015

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर करें हनुमानजी को प्रसन्न

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर करें हनुमानजी को प्रसन्न

मित्रों
ज्येष्ठ मास हनुमान जी का प्रिय मास है और आज ज्येष्ठ पूर्णिमा और मंगलवार का सुंदर संयोग बन रहा है साथ ही मंगल की राशि वृश्चिक में चन्द्रमा और साथ में शुभ अनुराधा नक्षत्र इसे विशेष बनाते हैं जो हनुमान जी को प्रसन्न करने और मनोकामना पूर्ति के लिए विशेष है।
आज की गयी हनुमान जी की पूजा और साधना दीर्घकालिक फल और लाभ देंगे। अपनी श्रद्धा, सुविधा और क्षमता अनुसार कम से कम एक प्रयोग अवश्य करें:-

1. हनुमान जी को आज सिंदूर का चोला चढ़ाएं।

2. हनुमान चालीसा, हनुमानाष्टक या बजरँग बाण के 11, 21 , 51 या 108 पाठ करें। अंत में अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

3. हनुमान जी को ध्वजा यानि झंडा भी अति प्रिय है तो एक केसरिया या लाल वस्त्र में श्री राम लिख कर सम्भव हो तो कम से कम 9 गांठ वाले बांस में उन्हें ध्वजा चढ़ाएं।

4. हनुमान जी को खीर भी अतिप्रिय है और आज पूर्णिमा भी है तो मन्दिर में मेवेयुक्त खीर बनाकर भोग लगाएं और छोटे बच्चों में बाँट दें।

5. काम में बार बार विघ्न आते हों तो 32 वट के पत्ते लेकर उनपर केसर या सिंदूर से श्री राम लिख कर उनकी माला बनाकर हनुमान जी को पहनाएं।

6. लम्बे समय से कोई काम लटका हो तो 5 मीठे पान के बीड़े अर्पित करें।

7. अज्ञात कारणों से बुरे स्वप्न आते हों या डर लगता हो तो 108 लौंग की माला बनाकर हनुमान जी को अर्पित करें।

8. एक विशेष शाबर मन्त्र साधना प्रयोग:-

अनिष्टों से रक्षा तथा भय से मुक्ति के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप करना चाहिए।

"आसन बांधू, वासन बांधू, बांधू अपनी काया। चारि खूंट धरती के बांधू हनुमत तोर दोहाई।।"

साधारण शब्दों का यह छोटा सा मंत्र अद्भुत प्रभाव वाला दिव्य मंत्र है।

इसके जप से गंभीर से गंभीर अनिष्टों से रक्षा होती है।
ये मन्त्र मात्र 10000 जप से सिद्ध हो जाता है। एक मंगल से शुरू कर अगले मंगल तक जप पूर्ण करें और जप के बाद 108 आहुति घी युक्त गुग्गुल और चन्दन के बुरादे की आम की लकड़ी या गोबर के उपलों पर दें।
इस हवन की भस्म को भी सम्हाल कर रख लें।
बच्चों को नज़र लगने, डरने चौंकने पर, पेट में दर्द या बहुत ज्यादा रोने पर, बच्चे या बड़े के किसी भी प्रकार डरने या पीड़ा अथवा ऊपरी बाधा के लक्षण दिखने पर उक्त भस्म का 21 बार अभिमन्त्रित तिलक कर दें और चुटकी भर खिला देने से तुरन्त आराम मिलता है।

इस मंत्र के कुछ अन्य प्रयोग:

(क) घर/ दुकान को बांधने के लिए

हनुमान जी के मंदिर के समीप स्थित बरगद या पीपल के वृक्ष की छोटी-छोटी चार टहनियां ले लें और उसी मंदिर में हनुमान जी के समक्ष रखकर उक्त मंत्र का एक माला (108 बार) जप करें और टहनियां घर ले आएं। अगले दिन पुनः उन टहनियों को लेकर उसी मंदिर में जाएं, 108 बार उक्त मंत्र का जप करें और पुनः वापस ले आएं। ऐसा 16 दिन करें। सत्रहवें दिन उन टहनियों को अपने घर या दुकान या कार्यालय के चारों दिशाओं में गाड़ दें। एक बार में सिर्फ चार टहनियां ही अभिमंत्रित करें। यह प्रयोग स्वयं करे, किसी अन्य व्यक्ति से न कराए।

(ख) स्वयं की रक्षा के लिए

हनुमान जी को लाल धागे में बनी लाल फूलों की माला चढ़ाएं। फिर वहीं मंदिर में बैठकर उक्त मंत्र का 32 माला जप करें। फिर उस माला फूलों को सावधानी से निकाल कर मंदिर की दहलीज पर रख दें और लाल धागा घर ले आएं। रात्रि में 10 बजे के बाद उक्त धागे में सात बार बारी बारी से मंत्र बोलकर सात गांठ लगाएं। फिर इस माला को हाथ अथवा गले में धारण करें, संकटों से रक्षा होगी।

(ग) आय  / व्यापर वृद्धि के लिए

एक नींबू, पांच साबुत सुपारियां, एक हल्दी की गांठ, काजल की डिबिया, 16 साबुत काली मिर्च, पांच लौंग तथा रुमाल के आकार का लाल कपड़ा घर या मंदिर में एकांत में बैठ जाएं। उक्त मंत्र का 108 बार जप करके उक्त सामग्री को लाल कपड़े में बांध लें। इस पोटली को घर या दुकान के मुख्य द्वार पर लगा दें, आय में वृद्धि होगी तथा व्यापार बंधन किये कराये आदि संकटों से मुक्ति मिलेगी। इस प्रयोग से कर्मचारियों की कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है और नौकरी व्यापार में स्थायित्व भी आ जाता है।

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Saturday, 30 May 2015

For Sharp Mind - Aarudha Saraswati stotra / ॥ आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्र ॥

॥ आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्र ॥

प्रार्थना

आरूढ़ा श्वेतहंसैर्भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं
वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्यम्
सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपै: शास्त्रविज्ञानशब्दै:
क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना ॥1॥
श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना
अर्चिता मुनिभि: सर्वैर्ॠषिभि: स्तूयते सदा
एवं ध्यात्वा सदा देवीं वाञ्छितं लभते नरै: ॥2॥
या कुन्देंदुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणा वरदण्डमंडितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ॥3॥
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद् व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहां
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ 4॥

बीजमन्त्रगर्भित स्तुति

ह्रीं ह्रीं ह्रद्यैकबीजे शशिरुचिकमले कल्पविस्पष्टशोभे
भव्ये भव्यानुकूले कुमतिवनदवे विश्ववन्द्याङ्घ्रिपद्मे
पद्मे पद्मोपविष्टे प्रणतजनमनोमोदसम्पादयित्रि
प्रोत्फुल्लज्ञानकूटे हरिनिजदयिते देवि संसारसारे ॥5॥
ऐं ऐं ऐं दृष्टमन्त्रे कमलभवमुखाम्भोजभूतस्वरूपे
रूपारूपप्रकाशे सकलगुणमये निर्गुणे निर्विकारे
न स्थूले नैव सूक्ष्मेऽप्यविदितविभवे नापि विज्ञानतत्त्वे
विश्वे विश्वान्तरात्मे सुरवरनमिते निष्कले नित्यशुद्धे ॥6॥
ह्रीं ह्रीं ह्रीं जाप्यतुष्टे शशिरुचिमुकुटे वल्लकीव्यग्रहस्ते
मातर्मातर्नमस्ते दह दह जड़तां, देहि बुद्धिं प्रशस्तां
विद्ये वेदान्तवेद्ये परिणतपठिते मोक्षदे मुक्तिमार्गे
मार्गातीतस्वरूपे भव मम वरदा शारदे शुभ्रहारे ॥7॥
धीं धीं धीं धारणाख्ये धृतिमतिनतिर्नामभि: कीर्तनीये
नित्येऽनित्ये निमित्ते मुनिगणनमिते नूतने वै पुराणे
पुण्ये पुण्यप्रवाहे हरिहरनमिते नित्यशुद्धे सुवर्णे
मातर्मात्रार्धतत्त्वे मतिमतिमतिदे माधवप्रीतिमोदे ॥8॥
हूं हूं हूं स्वरूपे दह दह दुरितं पुस्तकव्यग्रहस्ते
सन्तुष्टाकारचित्ते स्मितमुखि सुभगे जृम्भिणि स्तम्भविद्ये
मोहे मुग्धप्रवाहे कुरु मम विमतिध्वान्तविध्वंसमीड्ये
गीर्गौरवाग्भारति त्वं कविवररसनासिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ॥9॥
आत्मनिवेदन
स्तौमि त्वां त्वां च वन्दे मम खलु रसनां नो कदाचित्त्यजेथा
मा मे बुद्धिर्विरुद्धा भवतु न च मनो देवि मे यातु पापम्
मा मे दु:खं कदाचित् क्वचिदपि विषयेऽप्यस्तु मे नाकुलत्वं
शास्त्रे वादे कवित्वे प्रसरतु मम धीर्मास्तु कुण्ठा कदापि ॥10॥
इत्येतै: श्लोकमुख्यै: प्रतिदिनमुषसि स्तौति यो भक्तिनम्रो
वाणीं वाचस्पतेरप्यविदितविभवो वाक्पटुमृष्टकण्ठ:
या स्यादिष्टार्थलाभै: सुतमिव सततं वर्धते सा च देवी
सौभाग्यं तस्य लोके प्रभवति कवितां विघ्नमस्तं प्रयाति॥11॥
निर्विघ्नं तस्य विद्या प्रभवति सततं चाश्रुतग्रन्थबोध:
कीर्तिस्त्रैलोक्यमध्ये निवसित वदने शारदा तस्य साक्षात्
दीर्घायुर्लोकपूज्य: सकलगुणनिधि: सन्ततं राजमान्यो
वाग्देव्या: सम्प्रसादात् त्रिजगति विजयी सत्सभासु प्रपूज्य: ॥12॥

फलश्रुति
ब्रह्मचारी व्रती मौनी त्रयोदश्यां निरामिष:
सारस्वतो जन: पाठात्सकृदिष्टार्थलाभवान्
पक्षद्वये त्रयोदश्यां एकविंशतिसंख्यया
अविच्छिन: पठेद् धीमान् ध्यात्वा देवीं सरस्वतीं ॥14॥
सर्वपापविनिर्मुक्त: सुभगो लोकविश्रुत:
वाञ्छितं फलमाप्नोति लोकेऽस्मिन्नात्र संशय:
ब्रह्मणेति स्वयं प्रोक्तं सरस्वत्या: स्तवं शुभम्
प्रयत्नेन पठेन्नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥15॥
॥ इति आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

प्रजापति ब्रह्माजी द्वारा रचित यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली है। बचपन से ही इसके पाठ की आदत विद्यार्थी में होना चाहिए। 
इसके नित्य पाठ से बुद्धि तीव्र होती है, स्मरणशक्ति प्रबल होती है, प्रतिभा विकसित होती है एवं दोनों पक्ष (कृष्ण तथा शुक्ल) की त्रयोदशी को निरामिष रह 21 बार निरंतर पाठ करने से वाञ्छित फल प्राप्त होता है।

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।।जय श्री राम।।

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Pashupatastra stotra / पाशुपतास्त्र स्तोत्रम

पाशुपतास्त्र स्तोत्रम ( pashupatastra stotra )


इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है ।

 सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त के सकता है ।

 इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है ।

इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है ।

स्तोत्रम
ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिध्दिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिध्दाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे ।

ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट । हूंकारास्त्राय फट । वज्र हस्ताय फट । शक्तये फट । दण्डाय फट । यमाय फट । खडगाय फट । नैऋताय फट । वरुणाय फट । वज्राय फट । पाशाय फट । ध्वजाय फट । अंकुशाय फट । गदायै फट । कुबेराय फट । त्रिशूलाय फट । मुदगराय फट । चक्राय फट । पद्माय फट । नागास्त्राय फट । ईशानाय फट । खेटकास्त्राय फट । मुण्डाय फट । मुण्डास्त्राय फट । काड्कालास्त्राय फट । पिच्छिकास्त्राय फट । क्षुरिकास्त्राय फट । ब्रह्मास्त्राय फट । शक्त्यस्त्राय फट । गणास्त्राय फट । सिध्दास्त्राय फट । पिलिपिच्छास्त्राय फट । गंधर्वास्त्राय फट । पूर्वास्त्रायै फट । दक्षिणास्त्राय फट । वामास्त्राय फट । पश्चिमास्त्राय फट । मंत्रास्त्राय फट । शाकिन्यास्त्राय फट । योगिन्यस्त्राय फट । दण्डास्त्राय फट । महादण्डास्त्राय फट । नमोअस्त्राय फट । शिवास्त्राय फट । ईशानास्त्राय फट । पुरुषास्त्राय फट । अघोरास्त्राय फट । सद्योजातास्त्राय फट । हृदयास्त्राय फट । महास्त्राय फट । गरुडास्त्राय फट । राक्षसास्त्राय फट । दानवास्त्राय फट । क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट । त्वष्ट्रास्त्राय फट । सर्वास्त्राय फट । नः फट । वः फट । पः फट । फः फट । मः फट । श्रीः फट । पेः फट । भूः फट । भुवः फट । स्वः फट । महः फट । जनः फट । तपः फट । सत्यं फट । सर्वलोक फट । सर्वपाताल फट । सर्वतत्व फट । सर्वप्राण फट । सर्वनाड़ी फट । सर्वकारण फट । सर्वदेव फट । ह्रीं फट । श्रीं फट । डूं फट । स्त्रुं फट । स्वां फट । लां फट । वैराग्याय फट । मायास्त्राय फट । कामास्त्राय फट । क्षेत्रपालास्त्राय फट । हुंकरास्त्राय फट । भास्करास्त्राय फट । चंद्रास्त्राय फट । विघ्नेश्वरास्त्राय फट । गौः गां फट । स्त्रों स्त्रौं फट । हौं हों फट । भ्रामय भ्रामय फट । संतापय संतापय फट । छादय छादय फट । उन्मूलय उन्मूलय फट । त्रासय त्रासय फट । संजीवय संजीवय फट । विद्रावय विद्रावय फट । सर्वदुरितं नाशय नाशय फट ।

अन्य किसी जानकारी , कुंडली विश्लेषण और समस्या समाधान हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

।।जय श्री राम।।

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Monday, 25 May 2015

Dhoomavati jayanti 2015 धूमावती जयंती विशेष

धूमावती जयंती विशेष
26 मई 2015

 दस  महाविद्याओं  में सातवीं  महाविद्या हैं माँ धूमावती। इन्हे अलक्ष्मी या ज्येष्ठालक्ष्मी यानि लक्ष्मी की बड़ी बहन भी कहा जाता है। 
ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष अष्टमी को माँ धूमावती जयन्ति के रूप मइ मनाया जाता है।

 मां धूमावती विधवा स्वरूप में पूजी जाती हैं तथा इनका वाहन कौवा है, ये श्वेत वस्त्र धारण कि हुए, खुले केश रुप में होती हैं।  धूमावती महाविद्या ही ऐसी शक्ति हैं जो व्यक्ति की दीनहीन अवस्था का कारण हैं। विधवा के आचरण वाली यह महाशक्ति दुःख दारिद्रय की स्वामिनी होते हुए भी अपने भक्तों पर कृपा करती हैं।

इनका ध्यान इस प्रकार बताया है ’- अत्यन्त लम्बी, मलिनवस्त्रा, रूक्षवर्णा, कान्तिहीन, चंचला, दुष्टा, बिखरे बालों वाली, विधवा, रूखी आखों वाली, शत्रु के लिये उद्वेग कारिणी, लम्बे विरल दांतों वाली, बुभुक्षिता, पसीने से आद्‍​र्र, स्तन नीचे लटके हो, सूप युक्ता, हाथ फटकारती हुई, बडी नासिका, कुटिला , भयप्रदा,कृष्णवर्णा, कलहप्रिया, तथा जिसके रथ पर कौआ बैठा हो ऐसी देवी। 

देवी का मुख्य अस्त्र है सूप जिसमे ये समस्त विश्व को समेत कर महाप्रलय कर देती हैं।  

दस महाविद्यायों में दारुण विद्या कह कर देवी को पूजा जाता है।  शाप देने नष्ट करने व  संहार  करने की जितनी भी क्षमताएं है वो देवी के कारण ही है।  क्रोधमय ऋषियों की मूल शक्ति धूमावती हैं जैसे दुर्वासा, अंगीरा, भृगु, परशुराम आदि।  

सृष्टि कलह के देवी होने के कारण इनको कलहप्रिय भी कहा जाता है ,  चौमासा ही देवी का प्रमुख समय होता है जब इनको प्रसन्न किया जाता है। नरक चतुर्दशी देवी का ही दिन होता है जब वो पापियों को पीड़ित व दण्डित करती हैं।  
देश के कयी भागों में नर्क चतुर्दशी पर घर से कूड़ा करकट साफ कर उसे घर से बाहर कर अलक्ष्मी से प्रार्थना की जाती है की आप हमारे सारे दारिद्र लेकर विदा होइए।

ज्योतिष शास्त्रानुसार मां धूमावती का संबंध केतु ग्रह तथा इनका नक्षत्र ज्येष्ठा है। इस कारण इन्हें ज्येष्ठा भी कहा जाता है। ज्योतिष शस्त्र अनुसार अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में केतु ग्रह श्रेष्ठ जगह पर कार्यरत हो अथवा केतु ग्रह से सहयता मिल रही ही तो व्यक्ति के जीवन में दुख दारिद्रय और दुर्भाग्य से छुटकारा मिलता है। केतु ग्रह की प्रबलता से व्यक्ति सभी प्रकार के कर्जों से मुक्ति पाता है और उसके जीवन में धन, सुख और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। 

देवी का प्राकट्य :-

 पहली कहानी तो यह है कि जब सती ने पिता के यज्ञ में स्वेच्छा से स्वयं को जला कर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआँ निकला, उससे धूमावती का जन्म हुआ. इसीलिए वे हमेशा उदास रहती हैं. यानी धूमावती धुएँ के रूप में सती का भौतिक स्वरूप है. सती का जो कुछ बचा रहा- उदास धुआँ। 

 दूसरी कहानी यह है कि एक बार सती शिव के साथ हिमालय में विचरण कर रही थी. तभी उन्हें ज़ोरों की भूख लगी. उन्होने शिव से कहा-” मुझे भूख लगी है. मेरे लिए भोजन का प्रबंध करें.” शिव ने कहा-” अभी कोई प्रबंध नहीं हो सकता.” तब सती ने कहा-” ठीक है, मैं तुम्हें ही खा जाती हूँ।  ” और वे शिव को ही निगल गयीं।  शिव, जो इस जगत के सर्जक हैं, परिपालक हैं। 

फिर शिव ने उनसे अनुरोध किया कि’ मुझे बाहर निकालो’, तो उन्होंने उगल कर उन्हें बाहर निकाल दिया. निकालने के बाद शिव ने उन्हें शाप दिया कि ‘ अभी से तुम विधवा रूप में रहोगी.’

तभी से वे विधवा हैं-अभिशप्त और परित्यक्त.भूख लगना और पति को निगल जाना सांकेतिक है. यह इंसान की कामनाओं का प्रतीक है, जो कभी ख़त्म नही होती और इसलिए वह हमेशा असंतुष्ट रहता है. माँ धूमावती उन कामनाओं को खा जाने यानी नष्ट करने की ओर इशारा करती हैं। 

नोट :-  

अनुभवी साधको का मन्ना है की गृहस्त लोगों को देवी की साधना नही करनी चाहिए।  वहीँ कुछ का ऐसा मन्ना है की यदि इनकी साधना करनी भी हो घर से दूर एकांत स्थान में अथवा एकाँकी रूप से करनी चाहिए।  

विशेष ध्यान देने की बात ये है की इन महाविद्या का स्थायी आह्वाहन नहीं होता अर्थात इन्हे लम्बे समय तक घर में स्थापित या विराजमान होने की कामना नहीं करनी चाहिए क्यूंकि ये दुःख क्लेश और दरिद्रता की देवी हैं ।  इनकी पूजा के समय ऐसी भावना करनी चाहिए की देवी प्रसन्न होकर मेरे समस्त दुःख, रोग , दरिद्रता ,कष्ट ,विघ्न ,बढ़ाये, क्लेशादी को अपने सूप में समेत कर मेरे घर से विदा हो रही हैं और हमें धन , लक्ष्मी ,  सुख एवं शांति का आशीर्वाद दे रही हैं । 

निरंतर इनकी स्तुति करने वाला कभी धन विहीन नहीं होता व उसे दुःख छूते भी नहीं , बड़ी से बड़ी शक्ति भी इनके सामने नहीं टिक पाती इनका तेज सर्वोच्च कहा जाता है।  श्वेतरूप व धूम्र अर्थात धुंआ इनको प्रिय है पृथ्वी के आकाश में स्थित बादलों में इनका निवास होता है। 

देवी की स्तुति से देवी की अमोघ कृपा प्राप्त होती है

स्तुति :- 

विवर्णा चंचला दुष्टा दीर्घा च मलिनाम्बरा,

विवरणकुण्डला रूक्षा विधवा विरलद्विजा,

काकध्वजरथारूढा विलम्बित पयोधरा,

सूर्यहस्तातिरुक्षाक्षी धृतहस्ता वरान्विता,

प्रवृद्वघोणा तु भृशं कुटिला कुटिलेक्षणा,

क्षुतपिपासार्दिता नित्यं भयदा कलहप्रिया.

१       ॥ सौभाग्यदात्री धूमावती कवचम् ॥ 

धूमावती मुखं पातु  धूं धूं स्वाहास्वरूपिणी ।

ललाटे विजया पातु मालिनी नित्यसुन्दरी ॥१॥

कल्याणी ह्रदयपातु हसरीं नाभि देशके ।

सर्वांग पातु देवेशी निष्कला भगमालिना ॥२॥

सुपुण्यं कवचं दिव्यं यः पठेदभक्ति संयुतः ।

सौभाग्यमतुलं प्राप्य जाते देविपुरं ययौ ॥३॥

॥ श्री सौभाग्यधूमावतीकल्पोक्त धूमावतीकवचम् ॥

२                ॥ धूमावती कवचम् ॥

श्रीपार्वत्युवाच

धूमावत्यर्चनं शम्भो श्रुतम् विस्तरतो मया ।

कवचं श्रोतुमिच्छामि तस्या देव वदस्व मे ॥१॥

श्रीभैरव उवाच

शृणु देवि परङ्गुह्यन्न प्रकाश्यङ्कलौ युगे ।

कवचं श्रीधूमावत्या: शत्रुनिग्रहकारकम् ॥२॥

ब्रह्माद्या देवि सततम् यद्वशादरिघातिनः ।

योगिनोऽभवञ्छत्रुघ्ना यस्या ध्यानप्रभावतः ॥३॥

ओमस्य श्रीधूमावतीकवचस्य पिप्पलाद ऋषिरनुष्टुब्छन्दः

,श्रीधूमावती देवता, धूं बीजं ,स्वाहा शक्तिः ,धूमावती कीलकं ,

शत्रुहनने पाठे विनियोगः ॥

ॐ धूं बीजं मे शिरः पातु धूं ललाटं सदाऽवतु ।

धूमा नेत्रयुगम्पात वती कर्णौ सदाऽवतु ॥१॥

दीर्ग्घा तुउदरमध्ये तु नाभिम्मे मलिनाम्बरा ।

शूर्पहस्ता पातु गुह्यं रूक्षा रक्षतु जानुनी ॥२॥

मुखम्मे पातु भीमाख्या स्वाहा रक्षतु नासिकाम् ।

सर्वा विद्याऽवतु कण्ठम् विवर्णा बाहुयुग्मकम् ॥३॥

चञ्चला हृदयम्पातु दुष्टा पार्श्वं सदाऽवतु ।

धूमहस्ता सदा पातु पादौ पातु भयावहा ॥४॥

प्रवृद्धरोमा तु भृशङ्कुटिला कुटिलेक्षणा ।

क्षुत्पिपासार्द्दिता देवी भयदा कलहप्रिया ॥५॥

सर्वाङ्गम्पातु मे देवी सर्वशत्रुविनाशिनी ।

इति ते कवचम्पुण्यङ्कथितम्भुवि दुर्लभम् ॥६॥

न प्रकाश्यन्न प्रकाश्यन्न प्रकाश्यङ्कलौ युगे ।

पठनीयम्महादेवि त्रिसन्ध्यन्ध्यानतत्परैः ।।७॥

दुष्टाभिचारो देवेशि तद्गात्रन्नैव संस्पृशेत् । ७.१।

॥ इति भैरवीभैरवसम्वादे धूमावतीतन्त्रे धूमावतीकवचं 

सम्पूर्णम् ॥

३              धूमावती अष्टक स्तोत्रं

॥ अथ स्तोत्रं ॥

प्रातर्या स्यात्कुमारी कुसुमकलिकया जापमाला जपन्ती

मध्याह्ने प्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायाम् |

सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां

वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालिका पातु युष्मान् || १ ||

बद्ध्वा खट्वाङ्गकोटौ कपिलवरजटामण्डलम्पद्मयोनेः

कृत्वा दैत्योत्तमाङ्गैस्स्रजमुरसि शिर शेखरन्तार्क्ष्यपक्षैः |

पूर्णं रक्तै्सुराणां यममहिषमहाशृङ्गमादाय पाणौ

पायाद्वो वन्द्यमानप्रलयमुदितया भैरवः कालरात्र्याम् || २ ||

चर्वन्तीमस्थिखण्डम्प्रकटकटकटाशब्दशङ्घातम्-

उग्रङ्कुर्वाणा प्रेतमध्ये कहहकहकहाहास्यमुग्रङ्कृशाङ्गी |

नित्यन्नित्यप्रसक्ता डमरुडिमडिमां स्फारयन्ती मुखाब्जम्-

पायान्नश्चण्डिकेयं झझमझमझमा जल्पमाना भ्रमन्ती || ३ ||

टण्टण्टण्टण्टटण्टाप्रकरटमटमानाटघण्टां

वहन्ती

स्फेंस्फेंस्फेंस्कारकाराटकटकितहसा नादसङ्घट्टभीमा |

लोलम्मुण्डाग्रमाला ललहलहलहालोललोलाग्रवाचञ्चर्वन्ती

चण्डमुण्डं मटमटमटिते चर्वयन्ती पुनातु || ४ ||

वामे कर्णे मृगाङ्कप्रलयपरिगतन्दक्षिणे सूर्यबिम्बङ्कण्ठे

नक्षत्रहारंव्वरविकटजटाजूटके मुण्डमालाम् |

स्कन्धे कृत्वोरगेन्द्रध्वजनिकरयुतम्ब्रह्मकङ्कालभारं

संहारे धारयन्ती मम हरतु भयम्भद्रदा भद्रकाली || ५ ||

तैलाभ्यक्तैकवेणी त्रपुमयविलसत्कर्णिकाक्रान्तकर्णा

लौहेनैकेन कृत्वा चरणनलिनकामात्मनः पादशोभाम् |

दिग्वासा रासभेन ग्रसति जगदिदंय्या यवाकर्णपूरा

वर्षिण्यातिप्रबद्धा ध्वजविततभुजा सासि देवि त्वमेव || ६ ||

सङ्ग्रामे हेतिकृत्वैस्सरुधिरदशनैर्यद्भटानां

शिरोभिर्मालामावद्ध्य मूर्ध्नि ध्वजविततभुजा त्वं श्मशाने

प्रविष्टा |

दृष्टा भूतप्रभूतैः पृथुतरजघना वद्धनागेन्द्रकाञ्ची

शूलग्रव्यग्रहस्ता मधुरुधिरसदा ताम्रनेत्रा निशायाम् || ७ ||

दंष्ट्रा रौद्रे मुखेऽस्मिंस्तव विशति जगद्देवि सर्वं क्षणार्द्धात्

संसारस्यान्तकाले नररुधिरवशा सम्प्लवे भूमधूम्रे |

काली कापालिकी साशवशयनतरा योगिनी योगमुद्रा रक्तारुद्धिः

सभास्था भरणभयहरा त्वं शिवा चण्डघण्टा || ८ ||

धूमावत्यष्टकम्पुण्यं सर्वापद्विनिवारकम् |

यः पठेत्साधको भक्त्या सिद्धिं व्विन्दन्ति वाञ्छिताम् || ९ ||

महापदि महाघोरे महारोगे महारणे |

शत्रूच्चाटे मारणादौ जन्तूनाम्मोहने तथा || १० ||

पठेत्स्तोत्रमिदन्देवि सर्वत्र सिद्धिभाग्भवेत् |

देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः || ११ ||

सिंहव्याघ्रादिकास्सर्वे स्तोत्रस्मरणमात्रतः |

दूराद्दूरतरं य्यान्ति किम्पुनर्मानुषादयः || १२ ||

स्तोत्रेणानेन देवेशि किन्न सिद्ध्यति भूतले |

सर्वशान्तिर्ब्भवेद्देवि ह्यन्ते निर्वाणतां व्व्रजेत् || १३ ||

।। इत्यूर्द्ध्वाम्नाये धूमावतीअष्टक स्तोत्रं समाप्तम् ।।

 देवी की कृपा से साधक धर्म अर्थ काम और मोक्ष प्राप्त कर लेता है। गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में सिर्फ  पूजा करनी चाहिए।  

ऐसा मन जाता है की कुण्डलिनी चक्र के मूल में स्थित कूर्म में इनकी शक्ति विद्यमान होती है। देवी साधक के पास बड़े से बड़ी बाधाओं से लड़ने और उनको जीत लेने की क्षमता आ जाती है।  

महाविद्या धूमावती के मन्त्रों से  बड़े से बड़े दुखों का नाश होता है।  

१-   देवी माँ का स्वत: सिद्ध महामंत्र है-

ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा

अथवा

ॐ धूं धूं धूमावती ठ: ठ: 

इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं व देवी को पुष्प अत्यंत प्रिय हैं इसलिए केवल पुष्पों के होम से ही देवी कृपा कर देती है,आप भी मनोकामना के लिए यज्ञ कर सकते हैं,जैसे-

1. राई में नमक मिला कर होम करने से बड़े से बड़ा शत्रु भी समूल रूप से नष्ट हो जाता है 

2.नीम की पत्तियों सहित घी का होम करने से लम्बे समस से चला आ रहा ऋण नष्ट होता है 

3.जटामांसी और कालीमिर्च से होम करने पर काल्सर्पादी दोष नष्ट होते हैं व क्रूर ग्रह भी नष्ट होते हैं 

4. रक्तचंदन घिस कर शहद में मिला लेँ व जौ से मिश्रित कर होम करें तो दुर्भाग्यशाली मनुष्य का भाग्य भी चमक उठता है 

5.गुड व गाने से होम करने पर गरीबी सदा के लिए दूर होती है 

6 .केवल काली मिर्च से होम करने पर कारागार में फसा व्यक्ति मुक्त हो जाता है 

7 .मीठी रोटी व घी से होम करने पर बड़े से बड़ा संकट व बड़े से बड़ा रोग अति शीग्र नष्ट होता है 

२-   धूमावती गायत्री मंत्र:- 

ओम धूमावत्यै विद्महे संहारिण्यै धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात। 

वाराही विद्या में इन्हे धूम्रवाराही कहा गया है जो शत्रुओं के मारन और उच्चाटन में प्रयोग की जाती है।  

३ ) देवी धूमावती का शत्रु नाशक मंत्र 

ॐ ठ ह्रीं ह्रीं वज्रपातिनिये स्वाहा 

सफेद रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करें, नवैद्य प्रसाद,पुष्प,धूप दीप आरती आदि से पूजन करें। 

रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें, रात्री में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है 

सफेद रंग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें  दक्षिण दिशा की ओर मुख रखें 

यदि शत्रु से दुखी हैं तो इनकी पूजा करते हुए ऐसी कामना करनी चाहिए की देवी समस्त दुःख रोग क्लेश दारिद्र  के साथ अपने रौद्र रूप में शत्रु के घर में स्थायी रूप से विराजमान हो गयी हैं। देवी के वहां कौए ने अपने कुटुंब के साथ शत्रु के घर को अपना डेरा बना लिया है और शत्रु का घर निर्जन होने लगा है। 

४ ) देवी धूमावती का धन प्रदाता मंत्र

ॐ धूं धूं सः ह्रीं धुमावतिये फट 

नारियल, कपूर व पान देवी को अर्पित करें, काली मिर्च से हवन करें , रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें। 

५ ) देवी धूमावती का ऋण मोचक मंत्र

ॐ धूं धूं ह्रीं आं हुम 

देवी को वस्त्र व इलायची समर्पित करें , रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें।

किसी बृक्ष के किनारे बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है। सफेद रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें , उत्तर दिशा की ओर मुख रखें।  खीर प्रसाद रूप में चढ़ाएं।

६ ) देवी धूमावती का सौभाग्य बर्धक मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं धूं धूं धुमावतिये ह्रीं ह्रीं स्वाहा 

देवी को पान अर्पित करना चाहिए 

पूर्व दिशा की ओर मुख रख रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें।  एकांत में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है , सफेद रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें। 

 पेठा प्रसाद रूप में चढ़ाएं। 

७ ) देवी धूमावती का ग्रहदोष नाशक मंत्र

ॐ ठ: ठ: ठ: ह्रीं हुम स्वाहा 

देवी को पंचामृत अर्पित करें

उत्तर दिशा की ओर मुख रख रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें।  देवी की मूर्ती के निकट बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है  सफेद रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें। 

नारियल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

विशेष पूजा सामग्रियां-          पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती है 

सफेद रंग के फूल, आक के फूल, सफेद वस्त्र व पुष्पमालाएं ,  केसर, अक्षत, घी, सफेद तिल, धतूरा, आक, जौ, सुपारी व नारियल , चमेवा व सूखे फल प्रसाद रूप में अर्पित करें। 
सूप की आकृति पूजा स्थान पर रखें 
दूर्वा, गंगाजल, शहद, कपूर, चन्दन चढ़ाएं, संभव हो तो मिटटी के पात्रों का ही पूजन में प्रयोग करें। 

देवी की पूजा में सावधानियां व निषेध-

बिना गुरु दीक्षा के इनकी साधना कदापि न करें। थोड़ी सी भी चूक होने पर विपरीत फल प्राप्त होगा और पारिवारिक कलह दरिद्र का शिकार होंगे।
लाल वस्त्र देवी को कभी भी अर्पित न करें 
साधना के दौरान अपने भोजन आदि में गुड व गन्ने का प्रयोग न करें 
देवी भक्त ध्यान व योग के समय भूमि पर बिना आसन कदापि न बैठें 
पूजा में कलश स्थापित न करें 

व्यक्तिगत अनुभव :-
एक मित्र जो माँ धूमावती की साधना करते थे ने एक अष्टाक्षरी मन्त्र दिया था। रोज 21 जप मात्र करता था।
अचानक कुछ ऐसा हुआ की बड़ी देनदारी हो गयी और कुछ समझ नहीं आया की अब पैसे का इंतज़ाम कैसे हो।
माँ के उसी मन्त्र का जप शुरू कर दिया। 4 दिन में ही माँ की कृपा हुई और पैसों का इंतज़ाम हो गया।
ऐसा दो बार हुआ है इसलिए व्यक्तिगत अनुभव से तो यही कहूँगा की कृपा करने और धन देने में माँ धूमावती किसी दूसरी महाविद्या से कम नहीं हैं।

अन्य किसी जानकारी , कुंडली विश्लेषण और समस्या समाधान हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

।।जय श्री राम।।

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