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Saturday, 9 January 2016

Shani amavasya 2016 शनि अमावस्या


शनि अमावस्या और दशरथ कृत शनिस्तोत्र

मित्रों आज 9 जनवरी को इस वर्ष की प्रथम शनि अमावस्या है।

साल 2016 में तुला, वृश्चिक व धनु राशि पर शनि की साढ़ेसाती रहेगी तथा मेष व सिंह राशि पर शनि की ढैय्या चलेगी।

तुला राशि के लिये 2016

इस राशि के जातकों के लिए रजत पाद की पैरों से उतरती शनि की साढ़ेसाती रहेगी। तुला राशि में उतरती साढ़ेसाती पूरे वर्ष तुला राशि वालों के खर्चो में वृद्धि करायेगी। अनावश्यक रूप से शत्रुओं के विरोध का सामना करना पड़ेगा। कोई भी रिस्क लेकर करना उचित नहीं है। सरकारी या गैर सरकारी कार्यो में उलझे लोगों को पूरे वर्ष सावधानी बरतनी होगी। जन्म कुण्डली में जिन लोगों का गुरू अच्छा है, उन्हे आकस्मिक लाभ मिल सकता है।

वृश्चिक राशि के लिये 2016

इस राशि के जातकोे कें लिए लौह पाद की ह्रदय पर आयी हुयी साढ़े साती रहेगी। इस राशि वालों की छाती पर साढ़ेसाती रहने के कारण वृश्चिक राशि वालों को सावधान रहना होगा। ह्रदय रोगियों को अपने खान-पान पर विशेष सावधानी बरतनी होगी। इस राशि में जिनका जन्म ज्येष्ठा नक्षत्र में हुआ है, उन्हें अपने कार्यो के प्रति विशेष सर्तक रहना होगा। मित्रों से धोखा, स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव एंव कर्ज व व्याज आदि में हानि उठानी पड़ सकती है। इस राशि वालों को इन दिनों यात्राओं से बचना होगा।

धनु राशि के लिये 2016

इस राशि वालों के लिए ताम्रपाद की शिर पर चढ़ती हुुयी साढ़े साती रहेगी। धनु राशि वालों पर चढ़ती साढ़ेसाती धन हानि, शारीरिक पीड़ा, कार्यो में रूकावट, परिवारिक समस्याओं से जूझना होगा। क्रोध पर नियन्त्रण रखना होगा अन्यथा और मुसीबत में फॅस सकते हैं। इस वर्ष की अपेक्षा अगले वर्ष इस राशि वालों को विशेष कष्ट का सामना करना पड़ सकता है।

मेष राशि के लिये 2016

इस राशि के जातकों केे लिए शनि के स्वर्णपाद की ढैय्या का रहेगी। स्त्री जातकों को विशेेष सुख रहेगा। इस राशि वालों पर शनि की ढैय्या प्रारम्भ हो गयी है। अतः आप लोगों को अपने दिल व दिमाग पर नियन्त्रण रखकर काम करना होगा। कार्यो में जल्दबाजी करने से बचना होगा। इस राशि वालों को अपने सारे काम नियत समय करना होगा। लापरवाही व आलस्य आपके कैरियर में बाधक बन सकते हैं। नौकरी वाले लोगों के बार-बार संस्थान परिवर्तन करना हितकर नहीं रहेगा।

सिंह राशि के लिये 2016

इस राशि के लिए ताम्र्रपाद की ढैय्या रहेगी। नयीं व्याधि का आरम्भ हो सकता है। सन्तान को पीड़ा हो सकती है। पूरे वर्ष सिंह राशि पर शनि की ढैय्या का प्रभाव रहेगा। जिस कारण इन्हें धन, परिवार, स्वास्थ्य आदि से सम्बन्धित रूकावटें आयेंगी। रिस्की कार्यो से बचना होगा। व्यापारी वर्ग को ज्यादा निवेश करने से बचना होगा। स्वास्थ्य के मामलें में की गई लापरवाही मंहगी साबित हो सकती है।

यहाँ ध्यान देने की आवश्यकता है की इस वर्ष जिन राशि वालो को शनि साढ़ेसाती व  ढैया हो ,किन्तु उनकी व्यक्तिगत जन्म कुंडली में शनि श्रेष्ठ स्थान पर स्थित हो तथा दशा अंतर्दशा श्रेष्ठ चल रही हो उन जातको को शनि श्रेष्ठ फल प्रधान करेगा तथा अशुभ फल कम देगा।

जन्म कुंडली में चन्द्र तथा शनि अशुभ ग्रहो से युक्त अशुभ स्थानो पर हो तो शनि साढ़ेसाती एव  ढैया पीड़ा,चिन्ताकारक,धन हानि,रोज़गार में कमी,झगड़ा,धन खर्च,व्यर्थ कलह,पशु पीड़ा आदि अशुभ फलदायक होता है.

           
स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत है कि छाया सुत शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य से प्रार्थना की कि मै ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ जिसे आज तक किसी ने प्राप्त न किया हो, आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो और मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये चाहे वह देव,असुर,दानव, ही क्यों न हो | शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न हुए और उत्तर दिया कि इसके लिये उसे काशी जा कर भगवान शंकर कि आराधना करनी चाहिए | शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया और शिव ने प्रसन्न हो कर शनि को ग्रहत्व प्रदान कर नव ग्रह मंडल में स्थान दिया |

शनि की क्रूर दृष्टि का रहस्य

ब्रह्म पुराण के अनुसार शनि देव बाल्य अवस्था से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे |हर समय उन के ही ध्यान में मग्न रहते थे | विवाह योग्य आयु होने पर  इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से संपन्न हुआ |इनकी पत्नी भी साध्वी एवम तेजस्विनी थी | एक  बार वह पुत्र प्राप्ति की कामना से शनिदेव के निकट आई | उस समय शनि ध्यान मग्न थे अतः उन्हों ने अपनी पत्नी की ओर दृष्टिपात तक नहीं किया |लंबी प्रतीक्षा के बाद भी जब शनि का ध्यान भंग नहीं हुआ तो  वह ऋतुकाल निष्फल हो जाने के कारण से क्रोधित हो गयी और शनि को शाप दे दिया कि – अब से तुम जिस पर भी दृष्टिपात करोगे वह नष्ट हो जाएगा |तभी से शनि कि दृष्टि को क्रूर व अशुभ समझा जाता है |

शनि भी सदैव अपनी दृष्टि नीचे ही रखते हैं ताकि उनके द्वारा किसी का अनिष्ट न हो |फलित ज्योतिष में भी शनि कि दृष्टि को अमंगलकारी कहा गया है |

  ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी शनि कि क्रूर  दृष्टि का वर्णन है | गौरी नंदन गणेश के जन्मोत्सव पर शनि बालक के दर्शन कि अभिलाषा से गए |मस्तक झुका कर बंद नेत्रों से माता पार्वती के चरणों में प्रणाम किया , शिशु गणेश माता कि गोद में ही थे | माँ पार्वती ने शनि को आशीष देते हुए प्रश्न किया ,” हे शनि देव ! आप गणेश को देख नहीं रहे हो इसका क्या कारण है |” शनि ने उत्तर दिया –“ माता ! मेरी सहधर्मिणी का शाप है कि मैं जिसे भी देखूंगा उसका अनिष्ट होगा ,इसलिए मैं अपनी दृष्टि नीचे ही रखता हूँ | “ पार्वती ने सत्य को जान कर भी दैववश शनि को बालक को देखने का आदेश दिया | धर्म को साक्षी मान कर शनि ने वाम नेत्र के कोने से बालक गणेश पर दृष्टिपात किया | शनि दृष्टि पड़ते ही गणेश का मस्तक धड से अलग हो कर गोलोक में चला गया | बाद में श्री हरि ने एक गज शिशु का मस्तक गणेश के धड से जोड़ा और उस में प्राणों का संचार किया |तभी से गणेश गजानन नाम से  प्रसिद्ध हुए |

पुराणों में शनि का स्वरूप एवम प्रकृति

मत्स्य पुराण के अनुसार शनि कि कान्ति इन्द्रनील मणि के समान है| शनि गिध्द पर सवार हाथ में धनुष बाण ,त्रिशूल व व्र मुद्रा से युक्त हैं |पद्म पुराण में शनि कि स्तुति में  दशरथ  उनकी प्रकृति का चित्रण करते हैं कि शनि का शरीर कंकाल के समान है,पेट पीठ से सटा हुआ है, शरीर का ढांचा विस्तृत है जिस पर मोटे रोएं स्थित हैं | शनि के नेत्र भीतर को धसें हैं तथा दृष्टि नीचे कि और है |शनि तपस्वी हैं व मंद गति हैं | भूख से व्याकुल व अतृप्त रहते हैं |शनि का वर्ण कृष्ण के समान नील है |

ज्योतिष शास्त्र में शनि

प्रमुख ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शनि दुष्ट ,क्रोधी, आलसी,लंगड़ा,काले वर्ण का ,विकराल,दीर्घ व कृशकाय शरीर का है |द्रष्टि नीचे ही रहती है , नेत्र पीले व  गढ्ढे दार हैं |शरीर के अंग व रोम कठोर तथा नख व दांत मोटे हैं |शनि वात प्रकृति का तमोगुणी ग्रह है |
शनि का रथ लोहे का है |वाहन गिद्ध है |सामान्यतः यह एक राशि में 30 मास तक भ्रमणशील रहता है तथा सम्पूर्ण राशि चक्र को लगभग 30 वर्ष में पूर्ण करता है | इस मंद गति के कारण ही इसका नाम शनैश्चर व मंद प्रसिद्ध है |
पद्म पुराण के अनुसार शनि जातक कि जन्म राशि से पहले ,दूसरे,बारहवें,चौथे व आठवें स्थान पर आने पर कष्ट देता है |

  ज्योतिष शास्त्र में शनि  को पाप व अशुभ  ग्रह माना गया है | ग्रह मंडलमें शनि को सेवक का पद प्राप्त है| यह मकर और कुम्भ  राशियों का स्वामी है |यह तुला   राशि में उच्च का तथा मेष राशि  में नीच का माना जाता है | कुम्भ इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है |शनि  अपने स्थान से तीसरे, सातवें,दसवें  स्थानको पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को अशुभकारक कहा गया है |जनमकुंडली मेंशनि  षष्ट ,अष्टम  भाव का कारक होता है |शनि   की सूर्य -चन्द्र –मंगल सेशत्रुता , शुक्र  – बुध से मैत्री और गुरु से समता है | यह स्व ,मूलत्रिकोण व उच्च,मित्र  राशि –नवांश  में ,शनिवार  में,दक्षिणायनमें , दिन के अंत में ,कृष्ण पक्ष में ,वक्री होने पर  ,वर्गोत्तम नवमांश में बलवान व शुभकारक होता है |

प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथोंके अनुसार शनि लोहा ,मशीनरी ,तेल,काले पदार्थ,रोग, शत्रु,दुःख ,स्नायु ,मृत्यु ,भैंस ,वात रोग ,कृपणता ,अभाव ,लोभ ,एकांत, मजदूरी, ठेकेदारी ,अँधेरा ,निराशा ,आलस्य ,जड़ता ,अपमान ,चमड़ा, पुराने पदार्थ ,कबाडी ,आयु ,लकड़ी ,तारकोल ,पिशाच बाधा ,संधि रोग ,प्रिंटिंग प्रैस ,कोयला ,पुरातत्व विभाग इत्यादि का कारक है |

शनि शांति के उपाय

घर में पारद और स्फटिक शिवलिंग का  विधानपूर्वक पूजा अर्चना कर, रूद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए।

सुंदरकाण्ड का पाठ एवं हनुमान उपासना, संकटमोचन का पाठ करें।

हनुमान चालीसा, शनि चालीसा और शनैश्चर देव के मंत्रों का पाठ करें।

शनि जयंती पर, शनि मंदिर जाकर, शनिदेव का अभिषेक कर दर्शन करें।

ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: के 23,000 जप करें फिर 27 दिन तक शनि स्तोत्र के चार पाठ रोज करें।

शनिवार को सायंकाल पीपल के पेड के नीचे  तेल का दीपक जलाएं।

घर के मुख्य द्वार पर, काले घोडे की नाल, शनिवार के दिन लगावें।

काले तिल, ऊनी वस्त्र, कंबल, चमडे के जूते, तिल का तेल, उडद, लोहा, काली गाय, भैंस, कस्तूरी, स्वर्ण, तांबा आदि का दान करें।

घोडे की नाल अथवा नाव की कील का छल्ला बनवाकर मघ्यमा अंगुली में पहनें।

कडवे तेल में परछाई देखकर, उसे अपने ऊपर सात बार उसारकर दान करें, पहना हुआ वस्त्र भी दान दे दें, पैसा या आभूषण आदि नहीं।
शनि विग्रह के चरणों का दर्शन करें, मुख के दर्शन से बचें।

शनिव्रत : श्रावण मास के शुक्ल पक्ष से, शनिव्रत आरंभ करें, 33 व्रत करने चाहिएँ, तत्पश्चात् उद्यापन करके, दान करे

नीचे प्रस्तुत है पूर्ण दशरथकृत शनि स्तोत्र

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशनि-स्तोत्र-मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, सौरिर्देवता, शं बीजम्, निः शक्तिः, कृष्णवर्णेति कीलकम्, धर्मार्थ-काम-मोक्षात्मक-चतुर्विध-पुरुषार्थ-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

कर-न्यासः-

शनैश्चराय अंगुष्ठाभ्यां नमः। मन्दगतये तर्जनीभ्यां नमः। अधोक्षजाय मध्यमाभ्यां नमः। कृष्णांगाय अनामिकाभ्यां नमः। शुष्कोदराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। छायात्मजाय करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि-न्यासः-

शनैश्चराय हृदयाय नमः। मन्दगतये शिरसे स्वाहा। अधोक्षजाय शिखायै वषट्। कृष्णांगाय कवचाय हुम्। शुष्कोदराय नेत्र-त्रयाय वौषट्। छायात्मजाय अस्त्राय फट्।

दिग्बन्धनः-
“ॐ भूर्भुवः स्वः”

ध्यानः-
नीलद्युतिं शूलधरं किरीटिनं गृध्रस्थितं त्रासकरं धनुर्धरम्।
चतुर्भुजं सूर्यसुतं प्रशान्तं वन्दे सदाभीष्टकरं वरेण्यम्।।

रघुवंशेषु विख्यातो राजा दशरथः पुरा।
चक्रवर्ती स विज्ञेयः सप्तदीपाधिपोऽभवत्।।१
कृत्तिकान्ते शनिंज्ञात्वा दैवज्ञैर्ज्ञापितो हि सः।
रोहिणीं भेदयित्वातु शनिर्यास्यति साम्प्रतं।।२
शकटं भेद्यमित्युक्तं सुराऽसुरभयंकरम्।
द्वासधाब्दं तु भविष्यति सुदारुणम्।।३
एतच्छ्रुत्वा तु तद्वाक्यं मन्त्रिभिः सह पार्थिवः।
व्याकुलं च जगद्दृष्टवा पौर-जानपदादिकम्।।४
ब्रुवन्ति सर्वलोकाश्च भयमेतत्समागतम्।
देशाश्च नगर ग्रामा भयभीतः समागताः।।५
पप्रच्छ प्रयतोराजा वसिष्ठ प्रमुखान् द्विजान्।
समाधानं किमत्राऽस्ति ब्रूहि मे द्विजसत्तमः।।६
प्राजापत्ये तु नक्षत्रे तस्मिन् भिन्नेकुतः प्रजाः।
अयं योगोह्यसाध्यश्च ब्रह्म-शक्रादिभिः सुरैः।।७
तदा सञ्चिन्त्य मनसा साहसं परमं ययौ।
समाधाय धनुर्दिव्यं दिव्यायुधसमन्वितम्।।८
रथमारुह्य वेगेन गतो नक्षत्रमण्डलम्।
त्रिलक्षयोजनं स्थानं चन्द्रस्योपरिसंस्थिताम्।।९
रोहिणीपृष्ठमासाद्य स्थितो राजा महाबलः।
रथेतुकाञ्चने दिव्ये मणिरत्नविभूषिते।।१०
हंसवर्नहयैर्युक्ते महाकेतु समुच्छिते।
दीप्यमानो महारत्नैः किरीटमुकुटोज्वलैः।।११
ब्यराजत तदाकाशे द्वितीये इव भास्करः।
आकर्णचापमाकृष्य सहस्त्रं नियोजितम्।।१२
कृत्तिकान्तं शनिर्ज्ञात्वा प्रदिशतांच रोहिणीम्।
दृष्टवा दशरथं चाग्रेतस्थौतु भृकुटीमुखः।।१३
संहारास्त्रं शनिर्दृष्टवा सुराऽसुरनिषूदनम्।
प्रहस्य च भयात् सौरिरिदं वचनमब्रवीत्।।१४

शनिउवाच-
पौरुषं तव राजेन्द्र ! मया दृष्टं न कस्यचित्।
देवासुरामनुष्याशऽच सिद्ध-विद्याधरोरगाः।।१५
मयाविलोकिताः सर्वेभयं गच्छन्ति तत्क्षणात्।
तुष्टोऽहं तव राजेन्द्र ! तपसापौरुषेण च।।१६
वरं ब्रूहि प्रदास्यामि स्वेच्छया रघुनन्दनः !

दशरथ उवाच-
प्रसन्नोयदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः।।१७
रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन्।
सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी।।१८
याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं।
एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम्।।१९
प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा।
पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ! ।।२०
प्रार्थयामास हृष्टात्मा वरमन्यं शनिं तदा।
नभेत्तव्यं न भेत्तव्यं त्वया भास्करनन्दन।।२१
द्वादशाब्दं तु दुर्भिक्षं न कर्तव्यं कदाचन।
कीर्तिरषामदीया च त्रैलोक्ये तु भविष्यति।।२२
एवं वरं तु सम्प्राप्य हृष्टरोमा स पार्थिवः।
रथोपरिधनुः स्थाप्यभूत्वा चैव कृताञ्जलिः।।२३
ध्यात्वा सरस्वती देवीं गणनाथं विनायकम्।
राजा दशरथः स्तोत्रं सौरेरिदमथाऽकरोत्।।२४

दशरथकृत शनि स्तोत्र
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।२५।।
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।२६
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।२७
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।२८
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ।।२९
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ।।३०
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।३१
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।३२
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।३३
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ।।३४
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः।
अब्रवीच्च शनिर्वाक्यं हृष्टरोमा च पार्थिवः।।३५
तुष्टोऽहं तव राजेन्द्र ! स्तोत्रेणाऽनेन सुव्रत।
एवं वरं प्रदास्यामि यत्ते मनसि वर्तते।।३६
दशरथ उवाच-
प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम्।
अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित्।।३७
प्रसादं कुरु मे सौरे ! वरोऽयं मे महेप्सितः।
शनि उवाच-
अदेयस्तु वरौऽस्माकं तुष्टोऽहं च ददामि ते।।३८
त्वयाप्रोक्तं च मे स्तोत्रं ये पठिष्यन्ति मानवाः।
देवऽसुर-मनुष्याश्च सिद्ध विद्याधरोरगा।।३९
न तेषां बाधते पीडा मत्कृता वै कदाचन।
मृत्युस्थाने चतुर्थे वा जन्म-व्यय-द्वितीयगे।।४०
गोचरे जन्मकाले वा दशास्वन्तर्दशासु च।
यः पठेद् द्वि-त्रिसन्ध्यं वा शुचिर्भूत्वा समाहितः।।४१
न तस्य जायते पीडा कृता वै ममनिश्चितम्।
प्रतिमा लोहजां कृत्वा मम राजन् चतुर्भुजाम्।।४२
वरदां च धनुः-शूल-बाणांकितकरां शुभाम्।
आयुतमेकजप्यं च तद्दशांशेन होमतः।।४३
कृष्णैस्तिलैः शमीपत्रैर्धृत्वाक्तैर्नीलपंकजैः।
पायससंशर्करायुक्तं घृतमिश्रं च होमयेत्।।४४
ब्राह्मणान्भोजयेत्तत्र स्वशक्तया घृत-पायसैः।
तैले वा तेलराशौ वा प्रत्यक्ष व यथाविधिः।।४५
पूजनं चैव मन्त्रेण कुंकुमाद्यं च लेपयेत्।
नील्या वा कृष्णतुलसी शमीपत्रादिभिः शुभैः।।४६
दद्यान्मे प्रीतये यस्तु कृष्णवस्त्रादिकं शुभम्।
धेनुं वा वृषभं चापि सवत्सां च पयस्विनीम्।।४७
एवं विशेषपूजां च मद्वारे कुरुते नृप !
मन्त्रोद्धारविशेषेण स्तोत्रेणऽनेन पूजयेत्।।४८
पूजयित्वा जपेत्स्तोत्रं भूत्वा चैव कृताञ्जलिः।
तस्य पीडां न चैवऽहं करिष्यामि कदाचन्।।४९
रक्षामि सततं तस्य पीडां चान्यग्रहस्य च।
अनेनैव प्रकारेण पीडामुक्तं जगद्भवेत्।।५०

पद्म पुराण में वर्णित शनि के  दशरथ को दिए गए वचन के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक शनि की लोह प्रतिमा बनवा कर शमी पत्रों से उपरोक्त स्तोत्र द्वारा पूजन करके तिल ,काले उडद व लोहे का दान प्रतिमा सहित करता है तथा नित्य विशेषतः शनिवार को भक्ति पूर्वक इस स्तोत्र का जाप करता है उसे दशा या गोचर में कभी शनि कृत पीड़ा नहीं होगी और शनि द्वारा सदैव उसकी रक्षा की जायेगी |

शनि की शांति के लिए शनि रत्न नीलम के स्थान पर उसकी रत्न जड़ी ताबीज़  मंगवाने के लिए अथवा

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।।जय श्री राम।।
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