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Saturday, 10 October 2026

मत्स्यसूक्तोक्त दुर्गा संकट नाशन स्तोत्र

शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं 

।। मत्स्यसूक्तोक्त दुर्गा संकट नाशन स्तोत्र ।।

यह स्तोत्र परम्परागत रूप से "मत्स्यसूक्तोक्त दुर्गा संकट नाशन स्तोत्र" नाम से प्रसिद्ध है। इसमें माँ दुर्गा के विविध दिव्य स्वरूपों का स्तवन करते हुए उनकी शरणागति व्यक्त की गई है तथा साधक उनके चरणों में संकटों से रक्षा एवं मंगल की प्रार्थना करता है।
इस स्तोत्र की फलश्रुति में कहा गया है कि जो साधक श्रद्धापूर्वक एवं नित्य इसका पाठ करता है, उस पर देवी की कृपा बनी रहती है तथा धन-धान्य की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

।। अथ स्तोत्रम् ।।

ॐ परब्रह्म स्वरूपाञ्च वेदगर्भा जगन्मयीम्।
शरण्ये त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।१।।

कामरूप्यां कामदां श्यामां कामरूपां मनोरमाम्।
ईश्वरीं त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।२।।

त्रिनेत्रां हास्य संयुक्तां सर्वालंकार भूषिताम्।
विजयां त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।३।।

ब्रह्मादिभिः स्त्रूयमानां सिद्धगन्धर्व सेविताम्।
भवानीं त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।४।।

निशुम्भ शुम्भ मथिनीं महिषासुर घातिनीम्। 
दिव्यरूपामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।५।।

विंशत्यर्द्ध भुजां देवीं शुद्ध कांचन संनिभाम्।
गौरीरूपामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।६।।

त्रिशूलं खड्गं चक्रं च बाणं शक्तिं परश्वधम्।
दधानां त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।७।।

जगन्मयीं महा विद्यां सृष्टि संहार कारिणीम्।
सर्वदैव अहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम्।।८।।

इदन्तु कवचं दिव्यं महा मन्त्रं महाफलम्। 
यः पठेन्मानवो नित्यं अस्मद्भक्ति समन्वितः।
धनं धान्यं प्रयच्छामि सकृदावर्तनेन तु।।९।।

।। इति मत्स्य सूक्तोक्त दुर्गा संकट नाशन स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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।।जय श्री राम।।

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Tuesday, 23 June 2026

बड़ा मंगल विशेष कार्यसिद्धि पाठ

ज्येष्ठ मास के आठवें और अंतिम बड़े मंगल की शुभकामनाएं 

**जीवन के हर क्षेत्र में हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए निम्न श्लोकों का पाठ करना चाहिए।


जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः। 
राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः।। 
दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्ट कर्मणः। 
हनूमान शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।। 
न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्। 
शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः।। 
अर्दयित्वा पुरीं लंकामभिवाद्य च मैथिलीम्। 
समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम्।।
 (बाल्मीकि रामायण 5/42/33-36)

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।।जय श्री राम।।

Abhishek B. Pandey

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