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Saturday, 6 August 2016

Nag Panchami 2016 mantra & stotra नाग पंचमी की कथा, नाग मन्त्र एवम् स्तोत्र

नाग पंचमी की कथा, नाग मन्त्र एवम् स्तोत्र

मित्रों,
 कल 7 अगस्त 2016 को नाग पंचमी का पर्व है जो देश भर में मनाया जाता है। प्रान्त अनुसार पूजन के तरिको में कुछ फर्क हो सकता है किन्तु महत्व सब जगह एक समान ही है। कहीं घरके मन्दिर आले में स्थापना गेरू चन्दन से की जाती है तो कहीं द्वार पर। कहीं मूर्ति पूजी जाती है तो कहीं बाम्बी। कहीं पञ्च नाग , कहीं अष्ट नाग तो कहीं 9 नाग पूजे जाते है ।

प्रस्तुत है नाग पंचमी की कथा, नाग मन्त्र एवम् स्तोत्

नागपंचमी का पौराणिक कथा एवं इतिहास : सत्य सनातन धर्म (आज के हिन्दू) ग्रन्थों व पुराणों के अनुसार, राक्षसों और देवताओं में संधि के उपरांत दोनों ने मिलकर समुद्र मंथन किया । इस मंथन से अनेकों तत्व सहित अत्यन्त श्वेत उच्चैःश्रवा नमक  एक अश्व भी निकला। जिसे देखकर नाग माता कदू्र अपनी सौतन विनता को बोली की देखो, यह अश्व सफेद है, परन्तु इसके बाल काले दिखाई पड़ते हैं। विनता ने कहा  नहीं, न तो यह अश्व श्वेत रंग का है न ही काला। इतना सुनकर कदू्र ने बोली आप मेरे साथ चाहो तो शर्त लगा लो जो भी शर्त हारेगी वो दूसरे की दासी बन होगी ।
विनता सत्य बोल रही थी अतएव उसने शर्त स्वीकार कर ली। तदोपरांत दोनों अपने स्थान पर चली गईं। उधर कदू्र ने अपने पुत्र नागों को बुला कर और सारा वृतान्त सुनाया और बोली कि आप सभी सूक्ष्म रूप के होकर इस अश्व से चिपक जाओ जिससे  मैं शर्त जीतकर विनता को दासी बना सकूं। अपनी माता के कथन सुनकर नागों ने बोला – मां हम आपका साथ नहीं दे सकते चाहे आप शर्त जीतो या हारो, परन्तु हम इस प्रकार छल नहीं करेंगे।
कदू्र ने कहा- तुमने मेरी बात नहीं मानी ? इसका दंड झेलने के लिए तैयार रहो मैं तुम्हें श्राप दे रही हूँ कि ‘पांडवों के वंशज  जनमेजय द्वारा जब सर्प यज्ञ किया जायेगा, तब तुम सब उस हवन अग्नि जल जाओगे। माता का श्राप सुन सभी घबरा गए  और बासुकि नाग को साथ लेकर ब्रह्म लोक  ब्रह्मा जी के पास गए और आप बीती घटना कह सुनाई। ब्रह्मा जी ने बोले – चिन्ता न करो, यायावर वंश में एक तपस्वी जरतकारु नामक ब्राह्मण का जन्म होगा। उसके साथ तुम्हारी बहन का विवाह होगा। उन दोनों का के घर आस्तिक नमक विख्यात पुत्र जन्म लेगा, वह जनमेजय द्वारा सर्प यज्ञ को रोक कर तुम्हारी रक्षा करेगा।
ब्रह्मा जी ने श्रावण शुक्ल पंचमी पंचमी के दिन ये वरदान  दिया था तथा आस्तिक मुनि ने भी उक्त कथानुसार  पंचमी को ही इन नागों की रक्षा की थी। इस लिए  तब से नागपंचमी की तिथि नाग वंश को अत्यन्त प्रिय है। कहते हैं जो लोग श्रावण शुक्ल पंचमी को व्रत कर नागों की पूजा करते हैं । बारह मास तक चतुर्थी तिथि को एक बार भोजन कर पंचमी को व्रत करते हैं एवं १२ प्रमुख नाग क्रमश अनंत, बासुकि, शंख व पद्म, कंबल, कर्कोटक तथा अश्वतर, घृतराष्ट,शंखपाल, एवं कालिया, तक्षक, और पिंगल इन सभी  नागों की बारह माह में क्रमशः पूजा विधान के साथ करते है। जिस यज्ञ विधान से जनमेजय अपने पिता परीक्षित के लिए यज्ञ  किया था।

जो कोई नाग पंचमी के दिन श्रद्धापूर्वक यह व्रत करता है उसे शुभफल सहित सर्प भय दूर हो जाता है । यह भी माना जाता है की इस दिन नागों को दूध से स्नान-पान कराने  नाग देव अभय दान देते हैं ।उनके परिवार में सर्पभय दूर हो जाता है। ऐसे जातक पर से वर्तमान में  कालसर्पयोग भी क्षीण हो जाता है।

।।श्री सर्प सूक्तम।।

ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग परोगमा:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।1।।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासु‍कि प्रमुखाद्य:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।2।।

कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।3।।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखाद्य।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।4।।

सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।5।।

मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखाद्य।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।6।।

पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।7।।

सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।8।।

ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पप्रचरन्ति।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।9।।

समुद्रतीरे ये सर्पाये सर्पा जंलवासिन:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।10।।

रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।11।।

l नवनाग स्तोत्र ll

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलं
शन्खपालं ध्रूतराष्ट्रं च तक्षकं कालियं तथा
एतानि नव नामानि नागानाम च महात्मनं
सायमकाले पठेन्नीत्यं प्रातक्काले विशेषतः
तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत

ll इति श्री नवनाग स्त्रोत्रं सम्पूर्णं ll

नाग गायत्री मंत्र :-

ॐ नव कुलाय विध्महे विषदन्ताय धीमहि
तन्नो सर्प: प्रचोदयात ll

नाग देवता कृपा प्राप्ति मंत्र :-

'सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था ये न्तरे दिवि संस्थिता:।।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।'

अर्थात् - संपूर्ण आकाश, पृथ्वी, स्वर्ग, सरोवर-तालाबों, नल-कूप, सूर्य किरणें आदि जहां-जहां भी नाग देवता विराजमान है। वे सभी हमारे दुखों को दूर करके हमें सुख-शांतिपूर्वक जीवन दें। उन सभी को हमारी ओर से बारंबार प्रणाम...।

 अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

।।जय श्री राम।।

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Thursday, 4 August 2016

Tantrik herb Apamarg तांत्रिक जड़ी बूटी अपामार्ग

 वनस्पति तन्त्र
तांत्रिक जड़ीबूटियां भाग - 10

अपामार्ग (चिरचिंटा/ लटजीरा) तंत्र:

मित्रों,
तंत्र और आयुर्वेद की एक बेहद अहम वनस्पति है अपामार्ग। आम बोलचाल की भाषा में चिरचिटा, चिड़चिड़ा, ओंगा और लटजीरा जैसे नामों से ये पहचाना जाता है। देश के लगभग हर हिस्से में ये आराम से मिल जाता है। इसके पौधे यत्र तत्र स्वतः ही उग जाते हैं। प्रायः एक वर्ष की आयु होने पर पौधा सूख जाता है किन्तु कुछ दुर्लभ पौधे 10-15 वर्ष की आयु भी प्राप्त कर लेते हैं उनके त्वक् और मूल भी विशिष्ट क्रियाओं में प्रयोग होती है।

अपामार्ग की ऊंचाई लगभग 60 से 120 सेमी होती है। आमतौर पर लाल और सफेद दो प्रकार के अपामार्ग देखने को मिलते हैं। सफेद अपामार्ग के डंठल व पत्ते हरे रंग के, भूरे और सफेद रंग के दाग
युक्त होते हैं। इसके अलावा फल चपटे होते हैं, जबकि लाल अपामार्ग का डंठल लाल रंग का और पत्तों पर लाल-लाल रंग के दाग होते हैं।

इस पर बीज नुकीले कांटे के समान लगते है इसके फल चपटे और कुछ गोल होते हैं दोनों प्रकार के अपामार्ग के गुणों में समानता होती है फिर भी सफेद
अपामार्ग श्रेष्ठ माना जाता है इनके पत्ते गोलाई लिए हुए 1 से 5 इंच लंबे होते हैं चौड़ाई आधे इंच से ढाई इंच तक होती है- पुष्प मंजरी की लंबाई लगभग
एक फुट होती है, जिस पर फूल लगते हैं, फल शीतकाल में लगते हैं और गर्मी में पककर सूख जाते हैं। इनमें से चावल के दानों के समान बीज निकलते हैं।

इसकी दो प्रजातियां होती हैं सफेद और लाल। तंत्र और आयुर्वेद दोनों में ही इसकी दोनों की प्रजातियों का उपयोग होता है।

इस वनस्पति को रवि-पुष्य नक्षत्र मे या आवश्यकता होने पर विधि पूर्वक शुभ नक्षत्र में लाकर निम्न प्रयोग कर सकते हैं।

1. सन्तान प्राप्ति:-
सफेद अपामार्ग की जड़ को जलाकर भस्म बना लें। फिर इस भस्म का नित्य गाय के दूध के साथ सेवन करें, संतान सुख प्राप्त होगा।

2. धन प्राप्ति:-
सफेद लटजीरे की जड़ अपने पास रखने से धन लाभ, समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है।

3.  तिजारी ज्वर ( हर तीसरे दिन आने वाला बुखार)

चिरचिटा (अपामार्ग या ओंगा) की जड़ को लाल रंग के 7 धागों में रविवार के दिन लपेटकर रोगी
चिरचिटाकी कमर में बांध देने से `तिजारी बुखार´ चला जाता है।

4. सर्वजन वशीकरण

अपामार्ग, भृंगराज, लाजवन्ती, सहदेवी के मूल समभाग घिस कर तिलक करने से सर्वजन वशीकरण होता है।

5. सम्मोहन
इसकी जड़ का तिलक माथे पर लगाने से सम्मोहन प्रभाव उत्पन्न हो जाता है।

6. वाक् सिद्धि
इसकी डंडी की दातून 6 माह तक करने से वाक सिद्धि होती है। किन्तु यह अत्यंत दुष्कर है किसी न किसी कारण से क्रम टूट जाता है।

7. भूख बन्द
इसके बीजों को साफ करके चावल निकाल लें और दूध में इसकी खीर बना कर खाएं, भूख का अनुभव नहीं होगा। ( ये सिद्ध प्रयोग है किन्तु किसी जानकर के सानिध्य में ही करना चाहिए क्योंकि ये पेट बांध देता है अर्थात भूख के साथ साथ मल भी बन्द हो जाता है और लोगो को गर्मी, बेचैनी, ऐंठन मरोड़ हो जाते हैं  अतः बिना विरेचन जाने ये प्रयोग नहीं करना चाहिए)

8. विष नाश
विषनाश का मन्त्र पढ़कर इसकी 7 टहनियां लेकर सर्प, बिछू या ततैया के काटे स्थान पर झड़ने से विष उतर जाता है।

9. ऊपरी बाधा
यदि घर में ऊपरी बाधाओ का उपद्रव हो तो अपमार्ग और काले धतूरे के पौधे को जड़ समेत उखाड़ कर घर में गड्ढा कर उल्टा गाड़ने से उपद्रव शांत होते हैं।

10. रक्षा हेतु

अभिमन्त्रित श्वेत अपामार्ग-मूल को ताबीज में भर कर
लाल,पीले या हरे धागे में गूंथकर गले वा वांह में धारण करने से शत्रु, शस्त्र  आदि से रक्षा होती है।

11. वंचित प्रश्नों के उत्तर पाना

अभिमन्त्रित श्वेत अपामार्ग-मूल को चूर्ण करके हरे रंग के नवीन कपड़े में लपेट कर वर्तिका बना,तिल तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें।उस दीपक को एकान्त में रखकर उसकी लौ पर ध्यान केन्द्रित करने से वांछित दृश्य देखे जा सकते हैं। मान लिया किसी चोरी गई वस्तु की,अथवा गुमशुदा व्यक्ति के बारे में हम जानना चाहते हैं,तो इस प्रयोग को किया जा सकता है।

 (आपका ध्यान जितना केन्द्रित होगा, दृश्य और
आभास उतना ही स्पष्ट होगा। ये विद्या / सिद्धि लम्बे अभ्यास के बाद मिलती है, जो लोग निरन्तर त्राटक अभ्यास करते हैं उन्हें शीघ्र सफलता मिल सकती है)

१२. स्त्री वशीकरण
अपने वीर्य में अपामार्ग की जड़ , धतूरे की जड़, हरताल घोंट कर किसी स्त्री को 25 ग्राम खिला देने पर वशीकरण होता है।

|| अपामार्ग के अदभुत औषिधय गुण  ||

आइये जाने ये किस-किस काम में और क्या-क्या प्रयोग में काम आती है -

1. गुर्दे की पथरी (Kidney stone)

लगभग 1 से 3 ग्राम चिरचिटा के पंचांग का क्षार बकरी के दूध के साथ दिन में 2 बार लेते हैं। इससे गुर्दे की पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।

5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा 1 से 50 ग्राम सुबह- शाम मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने से गुर्दे की पथरी खत्म हो जाती है। इसकी क्षार अगर भेड़ के पेशाब के साथ खायें तो गुर्दे की
पथरी में ज्यादा लाभ होता है।

2. खूनी बवासीर (Bloody piles)

चिरचिटा की 25 ग्राम जड़ों को चावल के पानी में पीसकर बकरी के दूध के साथ दिन में 3 बार लेने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है।

3. कुष्ठ (Leprosy)

चिरचिटा के पंचांग का काढ़ा लगभग 14 से 28 मिलीलीटर दिन में 3 बार सेवन करने से कुष्ठ (कोढ़) रोग ठीक हो जाता है।

4. हैजा(Cholera)

चिरचिटा की जड़ों को 3 से 6 ग्राम तक की मात्रा में बारीक पीसकर दिन में 3 बार देने से हैजा में लाभ
मिलता है।

5. शारीरिक दर्द (Physical pain)
चिरचिटा की लगभग 1 से 3 ग्राम पंचांग का क्षार नींबू के रस में या शहद के साथ दिन में 3 बार देने से
शारीरिक दर्द में लाभ मिलता है।

6. तृतीयक बुखार (Tertiary fever)

इसकी ढाई पत्तियों को गुड़ में मिलाकर दो दिन तक सेवन करने से पुराना ज्वर उतर जाता है।

7. खांसी (cough)

चिरचिटा को जलाकर, छानकर उसमें उसके बराबर वजन की चीनी मिलाकर 1 चुटकी दवा मां के दूध के साथ रोगी को देने से खांसी बंद हो जाती है।

8. आंवयुक्त दस्त (Dysentery diarrhea)

चिरचिटा के कोमल के पत्तों को मिश्री के साथ मिलाकर अच्छी तरह पीसकर मक्खन के साथ धीमी आग पर रखे जब यह गाढ़ा हो जाये तब इसको खाने से ऑवयुक्त दस्त में लाभ मिलता है।

9. बवासीर (Hemorrhoids)

250 ग्राम चिरचिड़ा का रस, 50 ग्राम लहसुन का रस, 50 ग्राम प्याज का रस और 125 ग्राम सरसों का तेल
इन सबको मिलाकर आग पर पकायें। पके हुए रस में 6 ग्राम मैनसिल को पीसकर डालें और 20 ग्राम मोम डालकर महीन मलहम (पेस्ट) बनायें। इस मलहम को
मस्सों पर लगाकर पान या धतूरे का पत्ता ऊपर से चिपकाने से बवासीर के मस्से सूखकर ठीक हो जाते हैं।

चिरचिटा के पत्तों के रस में 5-6 काली मिर्च पीसकर पानी के साथ पीने से बवासीर में आराम मिलता है।

10. पक्षाघात-लकवा-फालिस- परालिसिस (Stroke-paralysis-Falis- paralysis)

एक ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से लकवा या पक्षाघात ठीक हो जाता है।

11. जलोदर (Dropsy)

चिरचिटा का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की
मात्रा में लेकर पीने से जलोदर (पेट में पानी भरना) की सूजन कम होकर समाप्त हो जाती है।

12. शीतपित्त (Urticaria)

अपामार्ग (चिरचिटा) के पत्तों के रस में कपूर और चन्दन का तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से शीतपित्त की खुजली और जलन खत्म होती है।

13. घाव -व्रण( wound)

फोड़े की सूजन व दर्द कम करने के लिए चिरचिटा, सज्जीखार अथवा जवाखार का लेप बनाकर फोड़े पर
लगाने से फोड़ा फूट जाता है, जिससे दर्द व जलन में रोगी को आराम मिलता है।

14 . उपदंश -सिफलिस( Syphilis)

चिरचिटा की धूनी देने से उपदंश के घाव मिट जाते हैं। 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ के रस को सफेद जीरे के 8 ग्राम चूर्ण के साथ मिलाकर पीने से उपदंश में बहुत लाभ होता है। इसके साथ रोगी को मक्खन भी साथ
में खिलाना चाहिए।

15. नाखून की खुजली (Nail itch)

चिरचिटा के पत्तों को पीसकर रोजाना 2 से 3 बार लेप करने से नाखूनों की खुजली दूर हो जाती है।

16. नासूर (Ulcer)

नासूर दूर करने के लिए चिरचिटे की पत्तियों को पानी में पीसकर रूई में लगाकर नासूर में भर दें। इससे नासूर मिट जाता है।

17. शरीर में सूजन (Inflammation in the
body)

लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में चिरचिटा खार, सज्जी खार और  जवाखार को लेकर पानी में पीसकर सूजन वाली गांठ पर लेप की तरह सेलगाने से सूजन दूर हो जाती है।

18. बच्चों के रोगों में लाभकारी
( Beneficial Children's Diseases)

अगर बच्चे की आंख में माता (दाने) निकल आये तो दूध में मूल को घिसकर आंख में काजल की तरह लगाएं।

19. बिच्छू का जहर(Poison Scorpion)

जिस बच्चे या औरत-आदमी के बिच्छू ने डंक मारा हो,उसे चिरचिटे की जड़ का स्पर्श करायें अथवा 2 बार
दिखायें। इससे जहर उतर जाता है।

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