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Tuesday, 2 June 2015

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर करें हनुमानजी को प्रसन्न

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर करें हनुमानजी को प्रसन्न

मित्रों
ज्येष्ठ मास हनुमान जी का प्रिय मास है और आज ज्येष्ठ पूर्णिमा और मंगलवार का सुंदर संयोग बन रहा है साथ ही मंगल की राशि वृश्चिक में चन्द्रमा और साथ में शुभ अनुराधा नक्षत्र इसे विशेष बनाते हैं जो हनुमान जी को प्रसन्न करने और मनोकामना पूर्ति के लिए विशेष है।
आज की गयी हनुमान जी की पूजा और साधना दीर्घकालिक फल और लाभ देंगे। अपनी श्रद्धा, सुविधा और क्षमता अनुसार कम से कम एक प्रयोग अवश्य करें:-

1. हनुमान जी को आज सिंदूर का चोला चढ़ाएं।

2. हनुमान चालीसा, हनुमानाष्टक या बजरँग बाण के 11, 21 , 51 या 108 पाठ करें। अंत में अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

3. हनुमान जी को ध्वजा यानि झंडा भी अति प्रिय है तो एक केसरिया या लाल वस्त्र में श्री राम लिख कर सम्भव हो तो कम से कम 9 गांठ वाले बांस में उन्हें ध्वजा चढ़ाएं।

4. हनुमान जी को खीर भी अतिप्रिय है और आज पूर्णिमा भी है तो मन्दिर में मेवेयुक्त खीर बनाकर भोग लगाएं और छोटे बच्चों में बाँट दें।

5. काम में बार बार विघ्न आते हों तो 32 वट के पत्ते लेकर उनपर केसर या सिंदूर से श्री राम लिख कर उनकी माला बनाकर हनुमान जी को पहनाएं।

6. लम्बे समय से कोई काम लटका हो तो 5 मीठे पान के बीड़े अर्पित करें।

7. अज्ञात कारणों से बुरे स्वप्न आते हों या डर लगता हो तो 108 लौंग की माला बनाकर हनुमान जी को अर्पित करें।

8. एक विशेष शाबर मन्त्र साधना प्रयोग:-

अनिष्टों से रक्षा तथा भय से मुक्ति के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप करना चाहिए।

"आसन बांधू, वासन बांधू, बांधू अपनी काया। चारि खूंट धरती के बांधू हनुमत तोर दोहाई।।"

साधारण शब्दों का यह छोटा सा मंत्र अद्भुत प्रभाव वाला दिव्य मंत्र है।

इसके जप से गंभीर से गंभीर अनिष्टों से रक्षा होती है।
ये मन्त्र मात्र 10000 जप से सिद्ध हो जाता है। एक मंगल से शुरू कर अगले मंगल तक जप पूर्ण करें और जप के बाद 108 आहुति घी युक्त गुग्गुल और चन्दन के बुरादे की आम की लकड़ी या गोबर के उपलों पर दें।
इस हवन की भस्म को भी सम्हाल कर रख लें।
बच्चों को नज़र लगने, डरने चौंकने पर, पेट में दर्द या बहुत ज्यादा रोने पर, बच्चे या बड़े के किसी भी प्रकार डरने या पीड़ा अथवा ऊपरी बाधा के लक्षण दिखने पर उक्त भस्म का 21 बार अभिमन्त्रित तिलक कर दें और चुटकी भर खिला देने से तुरन्त आराम मिलता है।

इस मंत्र के कुछ अन्य प्रयोग:

(क) घर/ दुकान को बांधने के लिए

हनुमान जी के मंदिर के समीप स्थित बरगद या पीपल के वृक्ष की छोटी-छोटी चार टहनियां ले लें और उसी मंदिर में हनुमान जी के समक्ष रखकर उक्त मंत्र का एक माला (108 बार) जप करें और टहनियां घर ले आएं। अगले दिन पुनः उन टहनियों को लेकर उसी मंदिर में जाएं, 108 बार उक्त मंत्र का जप करें और पुनः वापस ले आएं। ऐसा 16 दिन करें। सत्रहवें दिन उन टहनियों को अपने घर या दुकान या कार्यालय के चारों दिशाओं में गाड़ दें। एक बार में सिर्फ चार टहनियां ही अभिमंत्रित करें। यह प्रयोग स्वयं करे, किसी अन्य व्यक्ति से न कराए।

(ख) स्वयं की रक्षा के लिए

हनुमान जी को लाल धागे में बनी लाल फूलों की माला चढ़ाएं। फिर वहीं मंदिर में बैठकर उक्त मंत्र का 32 माला जप करें। फिर उस माला फूलों को सावधानी से निकाल कर मंदिर की दहलीज पर रख दें और लाल धागा घर ले आएं। रात्रि में 10 बजे के बाद उक्त धागे में सात बार बारी बारी से मंत्र बोलकर सात गांठ लगाएं। फिर इस माला को हाथ अथवा गले में धारण करें, संकटों से रक्षा होगी।

(ग) आय  / व्यापर वृद्धि के लिए

एक नींबू, पांच साबुत सुपारियां, एक हल्दी की गांठ, काजल की डिबिया, 16 साबुत काली मिर्च, पांच लौंग तथा रुमाल के आकार का लाल कपड़ा घर या मंदिर में एकांत में बैठ जाएं। उक्त मंत्र का 108 बार जप करके उक्त सामग्री को लाल कपड़े में बांध लें। इस पोटली को घर या दुकान के मुख्य द्वार पर लगा दें, आय में वृद्धि होगी तथा व्यापार बंधन किये कराये आदि संकटों से मुक्ति मिलेगी। इस प्रयोग से कर्मचारियों की कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है और नौकरी व्यापार में स्थायित्व भी आ जाता है।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

।।जय श्री राम।।
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Saturday, 30 May 2015

For Sharp Mind - Aarudha Saraswati stotra / ॥ आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्र ॥

॥ आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्र ॥

प्रार्थना

आरूढ़ा श्वेतहंसैर्भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं
वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्यम्
सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपै: शास्त्रविज्ञानशब्दै:
क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना ॥1॥
श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना
अर्चिता मुनिभि: सर्वैर्ॠषिभि: स्तूयते सदा
एवं ध्यात्वा सदा देवीं वाञ्छितं लभते नरै: ॥2॥
या कुन्देंदुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणा वरदण्डमंडितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ॥3॥
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद् व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहां
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ 4॥

बीजमन्त्रगर्भित स्तुति

ह्रीं ह्रीं ह्रद्यैकबीजे शशिरुचिकमले कल्पविस्पष्टशोभे
भव्ये भव्यानुकूले कुमतिवनदवे विश्ववन्द्याङ्घ्रिपद्मे
पद्मे पद्मोपविष्टे प्रणतजनमनोमोदसम्पादयित्रि
प्रोत्फुल्लज्ञानकूटे हरिनिजदयिते देवि संसारसारे ॥5॥
ऐं ऐं ऐं दृष्टमन्त्रे कमलभवमुखाम्भोजभूतस्वरूपे
रूपारूपप्रकाशे सकलगुणमये निर्गुणे निर्विकारे
न स्थूले नैव सूक्ष्मेऽप्यविदितविभवे नापि विज्ञानतत्त्वे
विश्वे विश्वान्तरात्मे सुरवरनमिते निष्कले नित्यशुद्धे ॥6॥
ह्रीं ह्रीं ह्रीं जाप्यतुष्टे शशिरुचिमुकुटे वल्लकीव्यग्रहस्ते
मातर्मातर्नमस्ते दह दह जड़तां, देहि बुद्धिं प्रशस्तां
विद्ये वेदान्तवेद्ये परिणतपठिते मोक्षदे मुक्तिमार्गे
मार्गातीतस्वरूपे भव मम वरदा शारदे शुभ्रहारे ॥7॥
धीं धीं धीं धारणाख्ये धृतिमतिनतिर्नामभि: कीर्तनीये
नित्येऽनित्ये निमित्ते मुनिगणनमिते नूतने वै पुराणे
पुण्ये पुण्यप्रवाहे हरिहरनमिते नित्यशुद्धे सुवर्णे
मातर्मात्रार्धतत्त्वे मतिमतिमतिदे माधवप्रीतिमोदे ॥8॥
हूं हूं हूं स्वरूपे दह दह दुरितं पुस्तकव्यग्रहस्ते
सन्तुष्टाकारचित्ते स्मितमुखि सुभगे जृम्भिणि स्तम्भविद्ये
मोहे मुग्धप्रवाहे कुरु मम विमतिध्वान्तविध्वंसमीड्ये
गीर्गौरवाग्भारति त्वं कविवररसनासिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ॥9॥
आत्मनिवेदन
स्तौमि त्वां त्वां च वन्दे मम खलु रसनां नो कदाचित्त्यजेथा
मा मे बुद्धिर्विरुद्धा भवतु न च मनो देवि मे यातु पापम्
मा मे दु:खं कदाचित् क्वचिदपि विषयेऽप्यस्तु मे नाकुलत्वं
शास्त्रे वादे कवित्वे प्रसरतु मम धीर्मास्तु कुण्ठा कदापि ॥10॥
इत्येतै: श्लोकमुख्यै: प्रतिदिनमुषसि स्तौति यो भक्तिनम्रो
वाणीं वाचस्पतेरप्यविदितविभवो वाक्पटुमृष्टकण्ठ:
या स्यादिष्टार्थलाभै: सुतमिव सततं वर्धते सा च देवी
सौभाग्यं तस्य लोके प्रभवति कवितां विघ्नमस्तं प्रयाति॥11॥
निर्विघ्नं तस्य विद्या प्रभवति सततं चाश्रुतग्रन्थबोध:
कीर्तिस्त्रैलोक्यमध्ये निवसित वदने शारदा तस्य साक्षात्
दीर्घायुर्लोकपूज्य: सकलगुणनिधि: सन्ततं राजमान्यो
वाग्देव्या: सम्प्रसादात् त्रिजगति विजयी सत्सभासु प्रपूज्य: ॥12॥

फलश्रुति
ब्रह्मचारी व्रती मौनी त्रयोदश्यां निरामिष:
सारस्वतो जन: पाठात्सकृदिष्टार्थलाभवान्
पक्षद्वये त्रयोदश्यां एकविंशतिसंख्यया
अविच्छिन: पठेद् धीमान् ध्यात्वा देवीं सरस्वतीं ॥14॥
सर्वपापविनिर्मुक्त: सुभगो लोकविश्रुत:
वाञ्छितं फलमाप्नोति लोकेऽस्मिन्नात्र संशय:
ब्रह्मणेति स्वयं प्रोक्तं सरस्वत्या: स्तवं शुभम्
प्रयत्नेन पठेन्नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥15॥
॥ इति आरूढ़ा सरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

प्रजापति ब्रह्माजी द्वारा रचित यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली है। बचपन से ही इसके पाठ की आदत विद्यार्थी में होना चाहिए। 
इसके नित्य पाठ से बुद्धि तीव्र होती है, स्मरणशक्ति प्रबल होती है, प्रतिभा विकसित होती है एवं दोनों पक्ष (कृष्ण तथा शुक्ल) की त्रयोदशी को निरामिष रह 21 बार निरंतर पाठ करने से वाञ्छित फल प्राप्त होता है।

अन्य किसी जानकारी , कुंडली विश्लेषण और समस्या समाधान हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

।।जय श्री राम।।

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